Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 242 of 4199

 

भाग-१ ] २३प

एटले पर्यायगत हीनाधिकपणानुं लक्ष छोडीने अने ध्रुव ज्ञायकभाव एकनुं लक्ष करीने-अनुभव करतां अनियतपणुं जूठुं छे, हीनाधिकपणुं कांई नथी; मात्र ध्रुव, ध्रुव वस्तुनो अनुभव छे. ए सम्यग्दर्शन छे, धर्म छे. स्वभावनी समीप जईने अनुभव करवो कहो, मुख्यनो अनुभव करवो कहो के अधिक स्वभावनो अनुभव करवो कहो- ए बधुं एकार्थवाचक छे. समयसार गाथा ३१ मां इन्द्रियोथी अधिक (भिन्न) आत्मस्वभावनो अनुभव करवानुं कह्युं, गाथा ११ मां त्रिकाळ स्वभावने मुख्य करीने एनो अनुभव करवानुं कह्युं अने अहीं स्वभावनी समीप जईने अनुभव करवानुं कह्युं. ए त्रणेय एकार्थवाची छे.

त्रिकाळी ज्ञायकभाव पर्यायथी अधिक छे. एटले पर्यायथी भिन्न छे. एवा ज्ञायकभावनी समीप जईने तेमां ज द्रष्टि करतां पर्याय लक्षमां रही नहीं अर्थात् अनुभवमां आवी नहीं माटे अनियतपणुं असत्यार्थ थई गयुं. पर्यायमां हीनाधिकता थाय छे ए अपेक्षाए अवस्थाविशेष आत्मानी अंदर छे, बीजा पदार्थमां-जडमां नथी. पण ते अंतर्मुख वस्तुमां द्रष्टि करवाथी हीनाधिकपणुं असत्यार्थ थई जाय छे. आम मुख्य-गौणनी वात छे.

भाई! लक्ष्मी-पैसो ए तो पूर्वनां पुण्य होय तो ढगला थई जाय छे, एमां कोई पुरुषार्थ करवो पडतो नथी. तथा महेनतथी ए मळे छे एम नथी. ज्यारे धर्म तो पुरुषार्थथी प्राप्त थाय छे. धर्म प्राप्त करवा माटे पोते पुरुषार्थ करवो जोईए.

चोथो बोलः– जेम सुवर्णनो, चीकणापणुं, पीळापणुं, भारेपणुं आदि गुणरूप भेदोथी अनुभव करतां विशेषपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे. सोनामां पीळाश, चीकाश, वजन आदि छे ने? भेदद्रष्टिथी जोतां सुवर्णमां ए पीळाश, चीकाश, वजन आदि छे ए सत्यार्थ छे, तोपण जेमां सर्व विशेषो विलय थई गया छे एवा सुवर्णस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां विशेषपणुं अभूतार्थ छे, असत्यार्थ छे. सुवर्ण, सुवर्ण, सुवर्ण एम एकला सुवर्णनी ज द्रष्टि करतां शुं चीकाश, पीळाश, आदि देखाय छे? एकरूप सामान्य सुवर्णनी द्रष्टिमां चीकाशादि सर्व विशेषो विलय थई जाय छे. द्रष्टिमां एकलुं सामान्य सुवर्ण आव्युं त्यां पीळाशादि भेदो अस्त थई जाय छे, ए भेदो द्रष्टिमांथी छूटी जाय छे. आ द्रष्टांत थयुं.

सिद्धांतः– एवी रीते आत्मानो, ज्ञान, दर्शन आदि गुणरूप भेदोथी अनुभव करतां विशेषपणुं भूतार्थ छे.-सत्यार्थ छे. शुं कहे छे? ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदि गुणरूप भेदोथी जोतां आवुं विशेषपणुं आत्मामां छे. पुद्गलादि बीजा कोई द्रव्यमां एवा भेदो नथी ए अपेक्षाए सत्यार्थ छे. (परमाणु आदिमां ज्ञान, दर्शन नथी) तोपण जेमां