सर्व विशेषो विलय थई गया छे. एवा आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां विशेषपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे प्रवचनसार गाथा १७२ ना अलिंगग्रहणना अढारमा बोलमां आवे छे के आत्मा गुणभेदने स्पर्शतो नथी. ‘लिंग एटले के गुण एवुं जे ग्रहण एटले के अर्थावबोध (पदार्थज्ञान) ते जेने नथी ते अलिंगग्रहण छे.’ अहीं ज्ञानगुणनी मुख्यताथी वात करी छे, परंतु बधा गुणभेद एमां लई लेवा. त्रिकाळीमां कोई गुणभेद छे नहीं. एक सामान्य ज्ञायकभाव- चैतन्यस्वभाव उपर द्रष्टि पडतां गुणभेद अस्त थई जाय छे, असत्यार्थ थई जाय छे. आत्मस्वभावनी समीप जईने एटले के भूतार्थ स्वभावने मुख्य करीने एनो आश्रय करवामां आवे अने गुणभेदने गौण करवामां आवे तो ज्ञान, दर्शन आदि भेदो अभूतार्थ छे. सोनामां भेद अपेक्षाए चीकाश, वजन आदि भेदो छे. पण भेदने जोतां ज्ञानमां अंश जणाय छे, आखी सुवर्ण-वस्तु द्रष्टिमां आवती नथी. अने आखी वस्तु द्रष्टिमां आव्या विना सुवर्णनुं यथार्थ ज्ञान थतुं नथी.
सोनीने त्यां कोई सोनानो दागीनो वेचवा लई जाय तो सोनी घाटनी किंमत चूकवतो नथी, केमके घाट एने मन कांई नथी. एना ज्ञानमां तो सोनानी किंमत छे. एवी रीते ज्ञानीना ज्ञानमां पर्यायविशेष के गुणविशेष कांई नथी. गाथा ७ मां आवे छे के ज्ञानीने ज्ञान, दर्शन आदि भेदो नथी. तो प्रश्न ऊठे के ते भेद शुं जडमां छे? ना, जडमां नथी. ज्ञान, दर्शन आदि छे तो आत्मामां, पण ज्ञानीने भेद उपर लक्ष नथी; केमके गुणभेदनी द्रष्टि करतां सामान्य त्रिकाळ ध्रुव आखी आत्मवस्तु अनुभवमां आवती नथी, आखी वस्तुनुं यथार्थ ज्ञान थतुं नथी. तेथी ज्ञानीने एक ज्ञायकभाव ज मुख्य छे, एने एनी ज किंमत छे. तेथी द्रव्यद्रष्टि थतां गुणभेद कांई नथी, असत्यार्थ छे.
ज्ञानपर्याय ज्यांसुधी पर अने राग तरफ झूके छे त्यांसुधी द्रव्यनुं ज्ञान नथी, त्यांसुधी परनुं अने रागनुं ज्ञान छे. परंतु ते पर तरफनो झुकाव छोडीने द्रव्य सन्मुख थई तेना आश्रये पर्याय उत्पन्न थाय छे तेमां आखा द्रव्यनुं-पूर्ण द्रव्यनुं ज्ञान थई जाय छे. आत्मा जेवो पूर्ण छे तेवुं पर्यायमां एनुं ज्ञानथवुं ते परिज्ञान-परिपूर्ण आत्मानुं ज्ञान छे. एने आत्मज्ञान अने सम्यग्ज्ञान कहेवामां आवे छे. एकला शास्त्रनुं, रागनुं, पर्यायनुं, के गुणभेदनुं ज्ञान ते ज्ञान ज नथी. (ए तो अज्ञान छे). परिपूर्णनी प्रतीति ते सम्यग्दर्शन अने परिपूर्णमां स्थिरता ते चारित्र छे. सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञानमां स्थिरता ए चारित्र एम नहीं, ए तो पर्यायो छे. परिज्ञान ए पर्याय छे. ए पर्यायमां आत्मा जेवो परिपूर्ण छे एने ज्ञेय बनावीने एनुं ज्ञान आवे, परंतु आखो आत्मा पर्यायमां आवतो नथी.