Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २३७

भाई! आ तो केवळज्ञानीना केडायतीनी वाणी छे. केवळीना विरह भूलावे एवी वात छे. जगतनां भाग्य के समयसार जेवुं शास्त्र रही गयुं, आवी वाणी भरतक्षेत्रमां रही गई. अहो! जैनदर्शन कोई अद्भुत अलौकिक छे. तेमां मूळस्वरूप-निश्चयस्वरूप तो यथार्थ छे ज के जे बीजे कयांय नथी, पण पर्याय के जे व्यवहार छे एनुं स्वरूप पण जैनदर्शनमां जेवुं बताव्युं छे एवुं बीजे कयांय नथी, एकेक भेदोनुं ज्ञान करावी पछी एनो निषेध करे छे. समयसार गाथा प० थी पप मां “भिन्नभिन्न शुभभाव छे, गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि भेदो छे, पण ए अनुभूतिथी भिन्न छे”-एम केवळज्ञानमां जे व्यवहार जणायो ए व्यवहारनुं ज्ञान करावी त्रिकाळीनी द्रष्टिमां एनो निषेध करे छे.

आम छे, भाई! सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञाननो विषय बहु सूक्ष्म छे. एनो पत्तो लागी गयो तो खलास. एना संसारनो अंत आवी जशे, पछी भले वर्तमानमां चारित्र न होय. दर्शन पाहुडमां आवे छे के-सिज्झंति य चरियभट्टा दंसणभट्टा न सिज्झंति– चारित्रथी भ्रष्ट तो मुक्तिने पामे छे, पण सम्यग्दर्शनथी भ्रष्ट जीव मुक्ति पामतो नथी. सम्यग्दर्शन छे पण जेने चारित्र नथी ते श्रद्धानना बळे ते स्वरूपमां रमणता करी मोक्षने पामशे. परंतु जेने श्रद्धा ज नथी ए स्थिरता शामां करशे? एने आत्मानी स्थिरता बनी शकती नथी. अहाहा...! आत्मानो एकरूप स्वभाव-ज्ञायक, ज्ञायक, ज्ञायक एवो जे अनादि-अनंत ध्रुव, ध्रुव चैतन्यभावनो एकसद्रश प्रवाह (पर्यायरूप नहीं) छे ते व्यवहारनयना आलंबनथी (भेदना लक्षे) प्राप्त थतो नथी. स्वामी-कार्तिकेयानुप्रेक्षामां पण पंडित श्रीजयचंदजीए ज्यां अर्थ कर्यो छे त्यां (गाथा ३११-३१२मां) आ वात लीधी छे के आत्माने दया, दान, भक्ति आदिना रागथी तथा मति, श्रुत आदि पर्यायथी तो अनादिथी जाण्यो छे. पण राग अने पर्यायने जाणतां एकरूप स्वभाव जाणवामां आवतो नथी. तेथी ए पर्यायोमां (भेदोमां) भेदने गौण करीने अभेदरूप अनंत एकभावरूप चैतन्यने ग्रहण करी वस्तुनुं-द्रव्यनुं ज्ञान कराव्युं छे. भाई! आत्मानी आवी यथार्थ समजण विना जे कांई क्रियाकांड करे ते व्यर्थ छे, एकडा विनानां मींडां छे.

पांचमो बोलः– जेम जळनो, अग्नि जेनुं निमित्त छे एवी उष्णता साथे संयुक्तपणारूप-तप्तपणारूप अवस्थाथी अनुभव करतां (जळने) उष्णपणारूप संयुक्तपणुं