Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३८ [ समयसार प्रवचन

भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे. शुं कहे छे? जळ तो स्वभावथी ठंडुं छे, पण पोतानी योग्यता अने अग्निना निमित्तथी पर्यायमां उष्ण थाय छे. उष्णता पोतानी पर्यायमां पोताथी छे, अग्नि तो निमित्तमात्र छे. पाणीनी उष्ण अवस्था अग्निथी थई छे एम नथी. उष्ण अवस्था थवानी ते समये जन्मक्षण छे तो थई छे. प्रवचनसार गाथा १०२ टीकामां आवो पाठ छे. हवे पर्यायद्रष्टिथी जोतां जळमां उष्णपणुं छे ते सत्य छे. अवस्थाथी जोतां जळने उष्णता साथे संयुक्तपणुं छे ते भूतार्थ छे, तोपण एकांतशीतळतारूप जळस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां (उष्णता साथे) संयुक्तपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. पाणीनो स्वभाव तो एकांत शीतळ छे. अवस्थामां उष्णपणुं छे ते काळे पण पाणीनो स्वभाव शीतळ ज छे. एवा जळना त्रिकाळ स्वभावनी सन्मुख थईने जोवामां आवे तो उष्णपणुं असत्यार्थ छे-अभूतार्थ छे.

सिद्धांतः– एवी रीते आत्मानो, कर्म जेनुं निमित्त छे एवा मोह साथे संयुक्तपणारूप अवस्थाथी अनुभव करतां संयुक्तपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे. शुं कहे छे? भगवान आत्मानी पर्यायमां जेटलो कर्मनो संबंध पामीने विकार उत्पन्न थाय छे ए वर्तमान पर्यायनी द्रष्टिथी जोतां सत्यार्थ छे. वेदांतनी जेम राग अने पर्याय नथी एम नहीं. तोपण जे पोते एकांत बोधरूप (ज्ञानरूप) छे एवा जीवस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां एटले के जीवस्वभावमां अंदर ऊंडा ऊतरतां संयुक्तपणुं अभूतार्थ छे. अहाहा! भगवान तारी चीज एकांत बोधरूप छे. भाषा जुओ. पोते एकांत ज्ञानस्वरूप छे. कोई ईश्वरे आत्माने ज्ञानस्वरूप बनाव्यो छे एम नथी. ज्ञानस्वभाव ए आत्मानुं सहज रूप छे. अग्निना निमित्ते पाणी पर्यायमां उष्ण थयुं छे त्यारे पण पाणीनो शीतळतारूप स्वभाव तो अंदर पडेलो ज छे. तेम भगवान आत्माने वर्तमान पर्यायमां कर्मना संबंधथी विकारी दुःखरूप दशा छे, त्यारे पण आत्मानो सहज आनंद, बोधरूप स्वभाव अंदर पडेलो ज छे. एवा स्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां एटले वर्तमान विकारी दशाने गौण करी एक ज्ञायकस्वभावनो आश्रय करतां आनंदनो अनुभव थाय छे ए अपेक्षाए दुःखरूप- संयुक्तपणारूप दशा असत्यार्थ छे, जूठी छे. बहु झीणी वात, भाई!

मूळ वात ज अत्यारे तो आखी गुलांट खाई गई छे, भूलाई गई छे. पूजा करो, भक्ति करो, दान करो, मंदिर बंधावो एटले कल्याण थई जशे एवुं बधुं संप्रदायमां चाले छे. मंदिर बंधाववामां मंदकषाय होय तोपण ते शुभभाव छे, बंधन छे. बनारसीदासे सिद्धांतमांथी काढी समयसार नाटक मोक्षद्वारमां कह्युं छे के छठ्ठे-सातमे गुणस्थाने झूलता भावलिंगी संतने के जेने त्रण कषायनो अभाव छे अने प्रचुर आनंदनुं स्वसंवेदन पर्यायमां वर्ते छे तेने पण जे शुभभावरूप महाव्रतनो विकल्प ऊठे छे ए ‘जगपंथ’ छे.