परमादी जगकौं धुकै, अपरमादी सिव ओर.’ ४०
अहाहा...! अंतरमां जेने आनंदनो अनुभव वर्ते छे, जेने परद्रव्यनुं कर्तापणुं तो दूर रहो, रागनुं कर्तापणुं पण छूटी गयुं छे एवा निर्ग्रंथ मुनिने पर्यायमां जे महाव्रतनो शुभराग आवे छे ते ‘जगपंथ’ छे.
कुंदकुंदाचार्यदेव स्वयं पुण्य-पाप अधिकारमां फरमावे छे के पुण्य छे ए संसारमां दाखल करे छे, एने भलुं केम कहेवाय? ज्यांसुधी पर्यायमां पूर्ण वीतरागता प्रगटी नथी त्यांसुधी अशुभथी बचवा शुभराग आवे, परंतु श्रद्धामां साधकने ए हेय छे, केमके ए ‘जगपंथ’ छे. मुनिने पण जेटलो शुभराग आवे छे ए प्रमाद छे अने संसारनुं कारण छे. भाई एकांत बोधस्वरूप जे ज्ञायकभाव ते एकना लक्ष विना जे कोई परना लक्षे राग उत्पन्न थाय छे ए ‘जगपंथ’ छे, पछी भले ए शुभराग भगवाननी भक्ति के स्मरणनो हो के महाव्रत संबंधी हो. कायरनां तो काळजां कंपी ऊठे एवी आ वात छे. श्रीमदे कह्युं छे ने केः-
औषध जे भवरोगनां, कायरने प्रतिकूळ.’
अंतरमां भगवान आत्मा शक्तिए मोक्षस्वरूपे बिराजे छे. एवा निजस्वभावनो आश्रय करतां जेटली वीतरागता-निर्मळ दशा उत्पन्न थाय ए मोक्षपंथ छे. अंतरस्वभावना आश्रयमां जे अप्रमत्तभाव उत्पन्न थाय ते शिवमार्ग- मुक्तिमार्ग छे. तथा जे पंचपरमेष्ठीमां भळेला छे, ‘णमो लोए सव्वसाहूणं’ एम जेमने गणधरदेवना नमस्कार पहोंचे छे तेवा भावलिंगी मुनि होय एमने पण जेटला पर तरफना लक्षे शुभराग उत्पन्न थाय छे ए जगपंथ-संसारपंथ छे. आकरी वात छे, भाई! लोकोए धर्म शुं छे ए कदी सांभळ्युं नथी.
शास्त्रमां पांच पांडवोनुं द्रष्टांत आवे छे. पांचे पांडवो शेत्रुंजा पर्वत उपर ध्यानमां ऊभा छे. त्यां दुर्योधननो भाणेज आवीने तेमने लोढाना धगधगता दागीना शरीर पर पहेरावे छे. पांचे पांडवो आत्म-अनुभवी छठ्ठे-सातमे गुणस्थाने झूलता भावलिंगी संतो छे. एमांथी युधिष्ठिर, भीम अने अर्जुन तो स्वरूपमां मग्न थई केवळज्ञान पामी मोक्षे गया. परंतु नकुल अने सहदेवने एवो शुभ विकल्प आव्यो के मोटाभाईने शुं थतुं हशे? केमके तेओ सहोदर अने साधर्मी छे एटले आवो विकल्प बे भाईओने आव्यो. तो तेना फळमां सर्वार्थसिद्धिना देवनुं त्रेत्रीश सागरनी स्थितिवाळुं आयुष्य बंधाई गयुं. तेत्रीस सागर सुधी