पोतामां जोतो नथी तेथी चतुर्गतिभ्रमणरूप संसार छे. अहीं कहे छे के आत्मा पोते एकांत ज्ञानरूप, आनंदरूप, सहज स्वभाव छे. ए स्वभावने मुख्य करी तेनो आश्रय करवाथी रागादि साथे संयुक्तपणुं अभूतार्थ-असत्यार्थ थई जाय छे अने ते धर्म छे, मुक्तिमार्ग छे.
आत्मा पांच प्रकारथी अनेकरूप देखाय छे. (१) अनादिकाळथी कर्मपुद्गलना संबंधथी बंधायेलो कर्मपुद्गलना स्पर्शवाळो देखाय छे. (२) कर्मना निमित्तथी थता नर-नारकादि पर्यायोमां भिन्न भिन्न गतिरूपे देखाय छे. घडीकमां मनुष्य तो घडीकमां देव इत्यादि भिन्न भिन्न गतिपणे देखाय छे. ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती हता. एने ९६ हजार राणीओ, ९६ क्रोड पायदळ, ९६ क्रोड गाम, ७२ हजार नगर, अने हीराना तो घरे पलंग हता; पण आयुष्य पूरुं थयुं अने बीजी क्षणे सातमी रौरव नरकमां गयो. अत्यारे सातमी नरकमां छे. भगवान कहे छे के मिथ्याश्रद्धानुं घूंटण अने अनंतानुबंधी कषायने ७०० वर्ष सेवीने तेत्रीस सागरोपमना आयुष्ये सातमी नरके छे. सातसो वर्षना जेटला श्वास थाय तेमां एक श्वासना कल्पित सुखना फळमां ११ लाख ९६ हजार नवसोपंचोतेर पल्योपमनुं दुःख त्यां भोगवशे. भाई! आ तो भगवानना मार्गनी गणतरी पण जुदी जातनी छे. आ रीते कर्मना निमित्तमां थवावाळी नर, नारकादि भिन्न भिन्न पर्यायोमां आत्मा देखाय छे. वर्तमानमां समर्थ राजा होय अने बीजी ज क्षणे नरकमां जन्मे. आवुं अनंतवार थई गयुं छे. (३) शक्तिना अविभाग प्रतिच्छेद (अंश) घटे पण छे, वधे पण छे. ज्ञानादि पर्यायोमां हीनाधिकता थाय छे. पर्यायमां हीनाधिकता थवी ए पर्यायनो स्वभाव छे, तेथी नित्य-नियत एकरूप देखातो नथी. (४) वळी ते दर्शन, ज्ञान आदि अनेक गुणोथी विशेषरूप देखाय छे. बीजा द्रव्योमां नथी एवा दर्शन, ज्ञान, चारित्र आदि गुणभेद विशेष अपेक्षाए आत्मामां छे. एकरूप सामान्य स्वभावमां ए नथी. (प) कर्मना निमित्तथी थता मोह-राग-द्वेष आदि परिणामो सहित ते सुखदुःखरूप देखाय छे. आ सौ अशुद्धद्रव्यार्थिकरूप व्यवहारनयनो विषय छे. भाषा जुओ. अशुद्धद्रव्यार्थिक केम कह्युं? पर्यायमां अशुद्धता थई छे ए अपेक्षाए अशुद्ध अने पोतामां पोताथी थई छे अने परथी नहि ए अपेक्षाए द्रव्यार्थिक कह्युं छे. त्रिकाळ आनंदरूप जे पोते एनी पर्यायमां जे अशुद्धता छे ए द्रव्यनुं पोतानुं पर्यायरूप परिणमन छे. ए पोतामां छे, बीजा द्रव्यमां नथी अने बीजा द्रव्यथी पण नथी.