अशुद्ध द्रव्य-द्रव्य तो अशुद्ध कदी होतुं ज नथी. पण पर्यायमां आ द्रव्य अशुद्ध ए अपेक्षाए अशुद्धद्रव्यार्थिकनय कह्युं. परमां नहि अने परथी नहि ए बताववा अशुद्धद्रव्यार्थिक नय कह्युं छे. तारी सत्तामां-पर्यायमां आ पांचे भावो छे ए अपेक्षाए द्रव्यने अशुद्धद्रव्यार्थिक कहीने व्यवहारनयनो विषय कह्यो. व्यवहारनयनो विषय एटले पर्यायनो विषय. अशुद्धद्रव्यार्थिकनय कहो, व्यवहारनय कहो के पर्यायार्थिकनय कहो-ए बधुं एकार्थवाचक छे. अशुद्धता तो पर्यायमां छे पण अहीं अशुद्धद्रव्यार्थिक केम लीधुं? द्रव्य पोते तो त्रिकाळ शुद्ध ज छे. पण द्रव्यनी पर्याय पोताथी पोतामां अशुद्ध थई छे, कर्मथी के कर्ममां अशुद्ध पर्याय थई नथी एम सिद्ध करवा द्रव्यने अशुद्धद्रव्यार्थिक कह्युं छे.
पर्यायमां द्रव्य अशुद्ध थयुं छे ए पर्यायद्रष्टिथी सत्यार्थ छे. परंतु आत्मानो एक स्वभाव आ नयथी ग्रहण थतो नथी. अने त्रिकाळी एकरूप स्वभाव द्रष्टिमां आव्या विना आत्मज्ञान थतुं नथी. अशुद्ध द्रव्यार्थिकनय पर्यायनी सत्ताने बतावे छे, पण एनाथी एकरूप स्वभावभाव चिदानंदमूर्ति ज्ञायकभाव नजरमां आवतो नथी. अने ज्ञायकने जाण्या विना अखंड एक आत्मानुं ज्ञान केम थाय? पांच प्रकारमां तो आत्मा अनेकरूपे देखाय छे. पण वस्तु तो अंदर अखंड एकरूप त्रिकाळ छे. भगवान आत्मा ज्ञान अने आनंदस्वभावथी भरपूर भरेली गोदाम छे. एवा आत्मानुं भेदद्रष्टि-अंशद्रष्टि-पर्यायद्रष्टिथी ज्ञान थतुं नथी. माटे व्यवहारनयथी प्रतिपक्ष शुद्धद्रव्यार्थिकनय अर्थात् निश्चयनयने मुख्य करी आत्माना एकस्वभावने ज्ञानमां ग्रहण करी, एक असाधारण ज्ञायकमात्र आत्मानो भाव लई मात्र ज्ञान, ज्ञान, ज्ञाननो पिंड, झळहळ ज्योति, एकरूप आखुं चैतन्यबिंब तेने शुद्धनयनी द्रष्टिथी सर्व परद्रव्योथी भिन्न, सर्व पर्यायोमां एकाकार, हानिवृद्धिथी रहित, विशेषोथी रहित अने नैमित्तिकभावोथी रहित जोवामां आवे तो पांचे भावोथी जे अनेकरूपपणुं छे ते अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. अंदर जे पूर्णानंदस्वरूप, ज्ञानघन, ध्रुव ज्ञायकभाव छे एमां द्रष्टि करी आश्रय करतां आ पांच पर्यायरूप भावो जूठा थई जाय छे.
बापु! आ तो जन्म-मरण जेनाथी मटे एनी वात छे. भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवे मोक्षपाहुड गाथा १६मां एम कह्युं छे के-“परदव्वादो दुग्गई सद्दव्वादो हु सग्गई होई” -जेटलुं लक्ष परद्रव्य उपर जशे एटलो राग उत्पन्न थशे, अने एना फळमां चार गति मळशे. सिद्धगति नहीं मळे. भाई, त्रणलोकना नाथ पण तारी अपेक्षाए परद्रव्य छे. एना लक्षथी राग ज उत्पन्न थशे, एनाथी पुण्यबंध थशे अने एथी स्वर्गादि मळशे. पण ए बधी दुर्गति छे. मनुष्यमां पैसावाळा थाय ए पण दुर्गति छे. अने स्वद्रव्यना आलंबनथी सुगति-सिद्धदशा प्राप्त थाय छे. बे शब्दोमां तो आखो सिद्धांत मूकी दीधो छे. आ तो अजर-अमर प्याला छे.