Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २४३

अहीं एम जाणवुं के वस्तुनुं स्वरूप अनंतधर्मात्मक छे, ते स्याद्वादथी यथार्थ सिद्ध थाय छे. आत्मा अनंतधर्मस्वरूप छे. आत्मामां गुणो अने पर्यायो ए बधा आत्माए धारी राखेला भाव होवाथी ए आत्माना धर्म छे. पर्यायमां शुद्धता के अशुद्धता छे ते पर्याये धारी राखेल छे तेथी धर्म छे. एमां ज्ञान, दर्शन, आनंद आदि अनंत धर्मो तो स्वाभाविक छे. अने पर्यायमां जे पुण्य-पाप आदि छे ते कर्मना संयोगथी थाय छे अने एनाथी आत्माने संसारनी प्रवृत्ति थाय छे. राग-द्वेषादि तीव्र होय तो नरक के तिर्यंचादिमां जाय छे अने मंद होय तो देव के मनुष्य थाय छे. ए बधी संसारनी प्रवृत्ति छे. ते संबंधी जे सुखदुःख आदि थाय छे तेने आत्मा भोगवे छे. खरेखर तो नरक के स्वर्गमां कयांय सुख नथी पण तेनी कल्पना करीने आत्मा सुखदुःख भोगवे छे. मनुष्य करतां स्वर्गमां घणी अनुकूळ सामग्री छे. पण एना पर लक्ष जतां पापभाव थाय छे अने ए दुःखरूप ज छे. स्वर्गना जीवो पण दुःखी ज छे. वर्तमान पर्यायमात्रने ज जोवी, रागादिने जोवा ए आ आत्माने अनादि अज्ञानथी पर्यायबुद्धि छे. तेने अनादि-अनंत एक आत्मानुं ज्ञान नथी.

भगवान आत्मा छे, छे, छे-एम त्रिकाळ ध्रुव, ध्रुव, ध्रुव-एकसद्रश प्रवाह अनादि-अनंत छे. आवा एकरूप आत्मानुं ज्ञान पर्यायबुद्धिवाळा अज्ञानी जीवोने होतुं नथी. ते बतावनार सर्वज्ञनुं आगम छे. जैनमत सिवायना अन्यमतमां सर्वज्ञ ज नथी. तेथी एमां आवुं वस्तुनुं यथार्थ स्वरूप बतावनार पण कोई नथी. सर्वज्ञ परमेश्वरे अंतरमां जे पूर्ण ‘ज्ञ’ स्वभाव-सर्वज्ञस्वभाव पडयो छे एना पूर्ण अवलंबनथी सर्वज्ञ पर्याय प्रगट करी. अने एवा सर्वज्ञ परमात्मानी वाणी ए आगम छे. तेमां शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी ए बताव्युं छे के आत्मानो एक असाधारण (बीजामां नथी एवो) चैतन्यभाव छे ते अखंड छे, नित्य छे, अनादिनिधन छे. एने जाणवाथी पर्यायबुद्धिनो पक्षपात मटी जाय छे. पर्याय छे खरी, पण हुं पर्याय जेटलो ज छुं एवो पक्षपात छूटी जाय छे. पर्यायनो नाश थई जाय छे एम नहीं, पण हुं अखंड एक ज्ञायकभाव छुं एम द्रष्टि थतां पोताने वर्तमान रागादि पर्याय जेटलो मान्यो छे ए पक्षपात मटी जाय छे.

शरीर, कर्म आदि परद्रव्योथी, तेमना भावोथी अने निमित्तथी थता पोताना विभावोथी पोताना आत्माने भिन्न जाणी एकरूप ज्ञायकभावनो जीव अनुभव करे त्यारे परद्रव्यना भावोरूप परिणमतो नथी. आत्मामां बे भाग पडे छे. एक ध्रुव, ध्रुव एक ज्ञायकभाव ते द्रव्य अने बीजी वर्तमान पर्याय. जेमां रागद्वेषादि भावो थाय छे. एमां पर्यायद्रष्टि ए व्यवहारद्रष्टि-मिथ्याद्रष्टि छे. ए पर्यायनी द्रष्टि छोडीने एनाथी प्रतिपक्ष