शुद्धनयनो जे विषय एकरूप चैतन्यमात्र अनंत अनंत गुणोनो पिंड आनंदकंद भगवान आत्मा छे ए एकनी द्रष्टि थतां पर्यायमां परना संबंधथी जे रागादि उत्पन्न थाय छे ए रूपे ते परिणमतो नथी. अरागी ज्ञायकभावनी द्रष्टि थतां पर्यायमां शुद्धता प्रगट थाय छे. अने अशुद्धता नाश पामे छे. अने तेथी कर्म बंधातां नथी अने संसारनी निवृत्ति थई जाय छे. स्वभावमां प्रवृत्ति पुष्ट थतां विकारी परिणमनथी निवृत्ति थई जाय छे अने आत्मा एकलो सिद्ध भगवान थई जाय छे.
अहा! बहारथी क्रिया करता होय एने एम लागे के आ तो कोई एल.एल.बी. नी ऊंची वातो छे, पण एम नथी. आ तो पहेला एकडानी वात छे. जैनधर्म एणे सांभळ्यो नथी. जैनधर्म ए कोई क्रियाकांड के संप्रदाय नथी. वस्तुना स्वभावनी द्रष्टि करीने अज्ञान अने रागद्वेषने जीतवां एनुं नाम जैनधर्म छे.
माटे पर्यायार्थिकरूप व्यवहारने गौण करी असत्यार्थ कह्यो छे, जुओ, भाषा केवी लीधी छे? व्यवहारने गौण करीने, अभाव करीने एम लीधुं नथी. पर्याय नथी एम नथी, पण ए द्रष्टिनो विषय नथी. तथा शुद्ध निश्चयनयने सत्यार्थ कही तेनुं आलंबन कराव्युं छे. शुद्धनयनो विषय जे त्रिकाळी शुद्ध आत्मा तेनुं ज आलंबन लेवानुं कह्युं छे. भगवाननी मूर्तिनुं आलंबन ए तो परनुं आलंबन छे. अहीं तो त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकभावना आलंबननी वात छे.
परवस्तु अने आत्माने तो कांई संबंध ज नथी. भाई! तारी पर्यायनुं पण लक्ष करवा जेवुं नथी तो परद्रव्यनुं लक्ष करवानुं तो कयां रह्युं? प्रवचनसार चरणानुयोग अधिकारमां आचार्यदेवे लीधुं छे के ज्यारे कोई जीव आत्मज्ञानपूर्वक वैराग्य प्रगट थवाथी दीक्षा लेवा तैयार थाय छे त्यारे ते कुटुंबीजनो पासे रजा लेवा जाय छे. पिता पासे जईने एम कहे छे के-‘आ पुरुषना शरीरना जनकना आत्मा! आ पुरुषनो आत्मा तमाराथी जनित नथी. हवे हुं मारी निर्मळ पर्यायनो जनक जे अनादि-अनंत त्रिकाळी द्रव्य तेनी पासे जवा मागुं छुं, मने रजा आपो.’ एवी ज रीते स्त्री पासे जईने एम कहे छे के-‘आ पुरुषना शरीरनी रमणीना आत्मा! आ पुरुषना आत्माने तुं रमाडती नथी. हवे हुं अनादि-अनंत त्रिकाळ अनुभूतिस्वरूप जे मारी स्त्री एनी पासे जवा मागुं छुं.’ हे माता-पिता! मारी चीज जे मारी पासे छे एनी पासे हुं जवा मागुं छुं. बहारमां जे विकल्पो ऊठे छे ते पण मारी चीज नथी, तो पर द्रव्योनी साथे तो मारे संबंध ज केवो?’ आत्माने परद्रव्य साथे कोई संबंध छे ज नहीं.