Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २४प

हवे आगळ कहे छे के-वस्तुस्वरूपनी प्राप्ति थया पछी तेनुं (शुद्धनयनुं) पण आलंबन रहेतुं नथी. पर्यायमां ज्यांसुधी पूर्णता प्रगटे नहीं त्यांसुधी द्रव्य तरफ झुकाव करवानो रहे छे. द्रव्य प्रति झुकावथी ज्यां पर्यायमां पूर्णता प्रगटी जाय पछी द्रव्यनुं आलंबन करवानुं रहेतुं नथी.

पर्यायार्थिक नयने गौण करी असत्यार्थ कह्यो छे अने शुद्धनयने सत्यार्थ कही तेनुं आलंबन कराव्युं छे. पूर्ण प्राप्ति थई गया पछी तेनुं पण आलंबन रहेतुं नथी. पूर्ण दशामां तो भेदाभेदनुं ज्ञान थया करे छे. आ कथनथी एम न समजवुं के शुद्धनयने सत्यार्थ कह्यो तेथी अशुद्धनय सर्वथा असत्यार्थ छे. पर्यायमां राग अने दुःख छे ए जूठुं छे एम नथी. ए तो द्रष्टिना विषयने मुख्य करीने, पर्यायने गौण करीने जूठी कही छे. अशुद्धनय सर्वथा असत्यार्थ ज छे एम मानवाथी वेदांतमतवाळा जेओ संसारने सर्वथा अवस्तु माने छे तेमनो सर्वथा एकांत पक्ष आवी जशे, अने तेथी मिथ्यात्व आवी जशे. वेदांत आत्माने सर्वव्यापक माने छे अने पर्यायमां भेद अने अनेकताने स्वीकारतो ज नथी. ए मतवाळा संसारने अवस्तु माने छे. एवी मान्यतापूर्वक शुद्धनयनुं आलंबन पण वेदांतीओनी जेम मिथ्याद्रष्टिपणुं लावशे. माटे सर्व नयोना कथंचित् रीते सत्यार्थपणाना श्रद्धानथी ज सम्यग्द्रष्टि थई शकाय छे.

पर्यायनयथी आत्माने जे कर्मनो संबंध, राग, अनेकता तथा गुणभेद छे ते सत्य छे, ते अवस्तु नथी; परंतु तेना लक्षे सम्यग्दर्शनादि प्रयोजननी सिद्धि थती नथी. सम्यग्दर्शनना प्रयोजननी सिद्धि तो एकमात्र अभेद, अखंड, एकरूप त्रिकाळी ज्ञायकनुं लक्ष करी आश्रय करवाथी थाय छे. तेथी ज दिगंबर संतोए प्रयोजननी- सम्यग्दर्शन आदिनी सिद्धि हेतु त्रिकाळीने मुख्य करी, निश्चय कही सत्यार्थ कही तेनुं आलंबन कराव्युं छे. तथा पर्यायने गौण करी, व्यवहार कही असत्यार्थ कही तेनुं लक्ष छोडाव्युं छे. त्रिकाळी शुद्ध आत्मा ज सम्यग्दर्शननो विषय अने ध्येय छे. आम छतां पर्याय छे ज नहीं एम मानीने द्रव्यनो आश्रय करवा जाय तो ते बनतो नथी, केमके द्रव्यनो आश्रय तो पर्याय करे छे. माटे पर्याय नथी एम मानतां आश्रय करवावाळुं कोई रहेतुं नथी. अने तो पछी जेनो आश्रय करवो छे ए द्रव्यवस्तु पण द्रष्टिमां आवती नथी.

आनंदघनजी एक ठेकाणे लखे छे केः-

गगनमंडलमें अधबीच कूआ, वहाँ है अमीका वासा;
सुगुरा होय
सो भरभर पीवै, नगुरा जावे प्यासा.