Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४६ [ समयसार प्रवचन

गगनमंडळमां आत्मा शरीरथी, कर्मथी अने वर्तमान पर्यायथी भिन्न अधबीच-अद्धर रहेलो छे. ए आखा आत्मामां अमृत भर्युं छे. अंदरमां अतीन्द्रिय आनंदथी भरेलो अमृतनो सागर छे. जेने माथे सुगुरु छे, जेने सुगुरुनी देशना प्राप्त थई छे के-सत्यार्थ चीजवस्तु आत्मा अनाकुळ अतीन्द्रिय सुखथी भरचक भरेलो छे, ते एमां अंतर्मुख द्रष्टि करी सुखामृतनुं पान भरीभरीने करे छे. परंतु जे अज्ञानी छे ते बहारमां-धन, पैसा, स्त्री, आबरूमां सुख शोधे छे तेनी प्यास बुझाती नथी. ते दुःखी ज रहे छे.

भाई! आत्मा वीतरागस्वरूप ज छे. चारित्रनी अपेक्षाए वीतरागस्वरूप, आनंदनी अपेक्षाए पूर्णआनंदस्वरूप, ज्ञाननी अपेक्षाए पूर्णज्ञानस्वरूप, श्रद्धानी अपेक्षाए पूर्णश्रद्धास्वरूप, प्रभुतानी अपेक्षाए पूर्णईश्वरस्वरूप आत्मा छे. आवा भेदो भेद अपेक्षाए सत्य छे. छतां ए भेदोनुं लक्ष करवाथी राग उत्पन्न थाय छे. ए बधी पर्यायद्रष्टि छे. पर्यायद्रष्टि ज्यांसुधी छे त्यांसुधी पूर्ण आत्मानो अनुभव थतो नथी. माटे पर्याय परथी द्रष्टि उठावी लई पूर्णानंदनी सत्तानुं-एक अखंड अभेद वस्तुनुं अवलंबन लई अतीन्द्रिय आनंद प्रगट कर. आ सम्यग्दर्शननी रीत छे.

आ रीते स्याद्वादने समजी जिनमतनुं सेवन करवुं. मुख्य गौण कथन सांभळी सर्वथा एकांत पक्ष न पकडवो. पर्यायने असत्यार्थ कही तो ए छे ज नहीं एम न मानवुं. स्याद्वादने समजी एटले पर्यायने गौण करीने असत्य अने द्रव्यने मुख्य करीने तेने सत्य कह्युं छे एम समजी जिनमतमां कहेला एक वीतरागस्वरूप त्रिकाळी आत्मानुं सेवन करवुं. पर्याय छे ज नहीं एवी मान्यता ए जिनमत नथी, तथा पर्यायनो आश्रय करवो ए पण जिनमत नथी. ए तो मिथ्यात्व छे.

आ गाथासूत्रनुं व्याख्यान करतां टीकाकार आचार्ये पण कह्युं छे के आत्मा व्यवहारनयनी द्रष्टिमां जे बद्धस्पृष्टादिरूप देखाय छे ते ए द्रष्टिमां तो सत्यार्थ ज छे, परंतु शुद्धनयनी द्रष्टिमां बद्धस्पृष्टादिपणुं असत्यार्थ छे. केमके अभेदमां पर्यायनो भेद नथी तथा अभेदनी द्रष्टि करतां भेद देखातो नथी. तेथी अभेदनो अनुभव कराववा माटे पर्यायने गौण करीने असत्यार्थ कही छे.

वळी अहीं एम जाणवुं के आ नय छे ते श्रुतज्ञानप्रमाणनो अंश छे. शुद्धनय हो के व्यवहारनय, ए श्रुतज्ञान प्रमाणनो अंश छे. त्रिकाळ ज्ञानगुण जेनुं लक्षण छे एवा द्रव्यनो अनुभव करीने जे भावश्रुतज्ञान प्रगट थयुं ए प्रमाणज्ञान छे. ए अवयवी छे अने नय तेना अवयव छे. भावश्रुतप्रमाणज्ञान ए ज्ञाननी वर्तमान अवस्था छे अने एनो