एक भाग ते नय छे. श्रुतज्ञान वस्तुने एटले के त्रिकाळी द्रव्यने परोक्ष जणावे छे. जेवी रीते सर्वज्ञ परमात्मा पूर्ण आत्माने प्रत्यक्ष देखे छे एम श्रुतज्ञानमां आत्मा प्रत्यक्ष देखातो नथी. शास्त्रोमां बे अपेक्षाए श्रुतज्ञानने पण प्रत्यक्ष कह्युं छे. (१) अनुभूतिमां अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आव्यो ए रीते स्वादना वेदननी अपेक्षाए प्रत्यक्ष कह्युं छे. (२) श्रुतज्ञान वडे ज्ञायकने जाणतां एमां राग के निमित्तनी अपेक्षा आवती नथी ए अपेक्षाए पण श्रुतज्ञानने प्रत्यक्ष कह्युं छे. (भावश्रुतज्ञान सीधुं राग के निमित्तनी अपेक्षा विना स्वने जाणे छे). शुद्धनयनो विषय जे पूर्ण आत्मा एने श्रुतज्ञान सर्वज्ञना आगम अनुसार पूर्ण जाणे छे. श्रुतज्ञानमां पूर्णने प्रत्यक्ष करीने देखे एम होतुं नथी. आम श्रुतज्ञान वस्तुने परोक्ष जणावे छे. तेम नय पण वस्तुने परोक्ष ज जणावे छे. श्रुतज्ञान परोक्ष छे, तो नय पण परोक्ष ज छे.
शुद्धद्रव्यार्थिकनयनो विषयभूत आत्मा बद्ध-स्पृष्ट आदि पांच भावोथी रहित चैतन्यशक्तिमात्र छे. ए शक्ति तो आत्मामां परोक्ष छे ज. आत्मामां ज्ञान, ज्ञान, ज्ञान एवा सामर्थ्यरूप चैतन्यस्वभाव परोक्ष छे. वळी तेनी व्यक्ति (शक्तिमांथी प्रगट थवारूप व्यक्तता) कर्मसंयोगथी मति-श्रुतादि ज्ञानरूप छे. (मति-श्रुतादि ज्ञानमां कर्मनुं निमित्त छे) ते कथंचित् अनुभवगोचर होवाथी प्रत्यक्षरूप पण कहेवाय छे. आत्मा वस्तु, ज्ञान शक्तिमान गुण, एनी मति-श्रुत आदि प्रगट व्यक्तता त्रणे आवी गयां. एमां सत्नुं सत्त्व भगवान आत्मा, चैतन्यशक्तिमात्र स्वभाव (गुण) परोक्ष छे. अने एवा द्रव्यनुं आलंबन लेवाथी शक्तिमांथी मति-श्रुतादि पर्याय प्रगट थई ए व्यक्त छे. पहेलां कह्युं के शुद्धनयनो विषय परोक्ष छे, ए तो त्रिकाळीनी वात करी. हवे ए त्रिकाळी ध्येयमां एकाग्र थईने जे मति, श्रुत पर्याय प्रगटी ए कथंचित् ज्ञान-गम्य-ज्ञान ज्ञानने सीधुं परनी मदद विना जाणे छे ए अपेक्षाए प्रत्यक्षरूप पण कहेवाय छे.
अने संपूर्ण जे केवळज्ञान ते जोके छद्मस्थने प्रत्यक्ष नथी तोपण आ शुद्धनय आत्माना केवळज्ञानरूपने परोक्ष जणावे छे. शुं कह्युं? केवळज्ञान पर्याय प्रगट नथी, पण आ शुद्धनय बतावे छे के आ सम्यग्ज्ञान प्रगट थयुं छे ते वधीने केवळज्ञान थशे. धवलमां ए पाठ छे के-मतिज्ञान केवळज्ञानने बोलावे छे. परोक्षज्ञानमां ए प्रतीतिमां आवी गयुं छे के आ मति-श्रुतादि पर्याय वधीने केवळज्ञान थशे ज. जयधवलमां पण लीधुं छे के-केवळज्ञान अवयवी छे अने मति, श्रुत एना अवयवो छे. अवयवथी अवयवी जाणवामां आवे छे. थांभलानी एक हांस जोतां जेम आखा थांभलानो निर्णय थई जाय छे तेम आत्मामां मति-श्रुत अवयव प्रगट थतां एमां केवळज्ञानरूप अवयवीनी प्रतीति थई जाय