Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४८ [ समयसार प्रवचन

छे. छद्मस्थने केवळज्ञान नथी, पण शुद्धनय परोक्षपणे एम बतावे छे के आ वर्तमान वर्ततुं ज्ञान पूर्ण थशे ए केवळज्ञान छे. श्रीमदे पण लीधुं छे ने के-श्रद्धा अपेक्षाए केवळज्ञान वर्ते छे, विचारदशाए केवळज्ञान थयुं छे, इच्छादशाए केवळज्ञान थयुं छे. इच्छा-भावना एनी ज छे ए अपेक्षाए केवळज्ञान थयुं छे एम कह्युं. उपरोक्त न्याये ते परोक्ष छे. आवो सर्वज्ञनो (स्याद्वाद) मार्ग छे.

मति-श्रुतज्ञान ए सर्वज्ञपदनी प्राप्तिनो उपाय छे. मति-श्रुत ए साधक छे अने केवळज्ञान साध्य छे. अष्टपाहुडमां चारित्रप्राभृतनी चोथी गाथामां तो मोक्षमार्गनी-ज्ञान-दर्शन-चारित्रनी पर्यायने ‘अक्षय-अमेय’ कही छे. समयसारमां मति-श्रुतज्ञान ए ‘उपाय’ छे अने केवळज्ञान-मोक्ष ए ‘उपेय’ छे. एम कह्युं छे. ‘उपायना’ ज्ञानमां ‘उपेय’ नी प्रतीति आवी जाय छे. नवतत्त्वनी प्रतीतिमां मोक्षनी प्रतीति आवे छे के नहीं? नवतत्त्वनी अभेद श्रद्धामां मोक्षनी श्रद्धा आवी जाय छे. तत्त्वार्थसूत्रमां जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष-एकवचनमां लीधुं छे. जेवुं शक्तिमां ज्ञान पूर्ण छे एवी आ मति-श्रुत पर्याय पूर्ण थई जशे एवी परोक्ष प्रतीति श्रुतज्ञानमां आवे छे.

हवे कहे छे-ज्यांसुधी आ नयने (शुद्धनयने) जीव जाणे नहीं त्यांसुधी आत्माना पूर्ण स्वरूपनुं ज्ञान-श्रद्धान थतुं नथी. शुद्धनयनो विषय अखंड, एक पूर्ण श्रद्धा-ज्ञानस्वरूप आत्मा छे. आवा आत्मामां झूकीने पर्याय ज्यांसुधी तेने जाणे नहीं त्यांसुधी तेनां श्रद्धा-ज्ञान थतां नथी. तेथी श्री गुरुए आ शुद्धनयने प्रगट करी उपदेश कर्यो छे के बद्ध-स्पृष्ट आदि पांच भावोथी रहित पूर्णज्ञानघन आत्माने जाणी (अंतर्मुख थईने जाणी) श्रद्धान करवुं, पर्यायबुद्धि न रहेवुं. संतो प्रसिद्ध करीने कहे छे के पूर्णज्ञान-घनस्वरूप आत्मानी द्रष्टि-श्रद्धा करो. आ शुद्धनय अखंड, एक, त्रिकाळी, ध्रुव, परमस्वभाव ज्ञायकभावने देखाडे छे. तेनी अंतर्मुख थई श्रद्धा करो.

अहीं कोई एवो प्रश्न करे के-एवो आत्मा प्रत्यक्ष तो देखातो नथी अने विना देख्ये श्रद्धान करवुं ते जूठुं श्रद्धान छे. तेनो उत्तरः-

देखेलानुं ज श्रद्धान करवुं ए तो नास्तिक मत छे. जिनमतमां-सर्वज्ञना शास्त्रमां तो प्रत्यक्ष अने परोक्ष बन्ने प्रमाण मानवामां आव्यां छे. तेमां आगम- प्रमाण परोक्ष छे. तेनो भेद शुद्धनय छे, प्रमाणथी अनुमान-ज्ञानमां परिपूर्ण ध्रुव आत्माने जाणी शुद्धनयनी द्रष्टिथी शुद्ध आत्मानुं श्रद्धान करवुं. भावश्रुतज्ञान परोक्ष छे, केमके एमां आत्माना असंख्यात प्रदेश अने अनंत गुण प्रत्यक्ष जणाता नथी. आ रीते ज्ञाननी