Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २४९

पर्यायमां अखंड, अभेद, पूर्ण आत्मा जे ज्ञेय छे एनुं ज्ञान करीने श्रद्धान करवुं. केवळ व्यवहार-प्रत्यक्षनो ज एकांत न करवो. अमने प्रत्यक्ष देखाय तो ज मानीए एम एकांत न करवो.

हवे शुद्धनयने मुख्य करी कळशरूप काव्य कहे छेः-

* कळश–११ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

अमृतचंद्राचार्यदेव जगतना जीवोने उद्देशीने कहे छेः- ‘जगत् तम् एव सम्यक्स्वभावम् अनुभवतु’ जगतना प्राणीओ ए सम्यक् स्वभावनो अनुभव करो- एटले पर्यायमां एनो साक्षात्कार करो, एनुं वेदन करो. सम्यक् एम एक शब्दमां तो बार अंगनो सार मूकी दीधो छे. एक ठेकाणे स्तुतिकार भगवाननी स्तुति करतां कहे छेः -

“प्रभु तुम जानग रीति सहु जग देखता हो लाल;
निजसत्ताए शुद्ध, सहुने
पेखता हो लाल.”

नाथ! आप आखा जगतने निजसत्ताए-पोताना होवापणे शुद्ध देखी रह्या छो. प्रत्येक आत्मा शुद्ध परिपूर्ण भगवानमयी छे एम आपना ज्ञानमां देखी रह्या छो.

अहाहा...! भाई, भगवाने जोयुं छे के तुं अंदर परिपूर्ण शुद्ध छो ने! तने अपूर्ण अने विपरीत मानतो ए तारुं अपमान छे. (अनादर छे) जेम कोई अबजपतिने निर्धन कहेवो ए एनुं अपमान छे तेम भगवान पूर्णानंदना नाथने दरिद्री मानवो ए एनुं अपमान छे. अहीं कहे छे के अंदर त्रिकाळ ध्रुव ज्ञानानंदस्वभावी अखंड एकस्वभाव आत्मा छे तेनो अनुभव करो, एनी सन्मुख ज्ञान अने द्रष्टि करीने वेदन करो. आवा सत्यस्वभावनी प्रतीतिने सम्यग्दर्शन कहे छे. ए सम्यग्दर्शनमां अतीन्द्रिय आनंदनो अंशे स्वाद आवे छे एने अनुभव कहे छे. आनंदनुं वेदन ए अनुभवनी महोर-छाप-मुद्रा-ट्रेडमार्क छे. समयसार गाथा प नी टीकामां आवे छे के-जेम डुंगरमांथी पाणी झरे एम मारो आनंदकंद डुंगर आत्मा छे एमां द्रष्टि पडतां मने निरंतर आनंद झरे छे. एवा आनंद झरता प्रचुर स्वसंवेदनथी मारा निजविभवनो जन्म छे. अनुभव आनंदना वेदन सहित ज होय छे.

भगवान आत्मा ज्ञान, आनंद एम अनंत गुणोथी परिपूर्ण छे. आचार्य कहे छे के-एवा आत्मानो साक्षात्कार करो, तेथी अतीन्द्रिय आनंद थशे. आत्माने छोडीने