Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२प० [ समयसार प्रवचन

बहारमां-स्त्री, पुत्र के आबरूमां-कयांय सुख नथी. ए बधां तो दुःखनां बाह्य निमित्तो छे. बनारसीदासे समयसारनाटकमां कह्युं छेः-

“अनुभव चिंतामनि रतन, अनुभव है रसकूप;
अनुभव मारग मोखकौ, अनुभव मोख सरूप.”

आनंदनो नाथ चैतन्यप्रभु जे आत्मा तेनी सन्मुख थतां जे अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आव्यो ते रत्नचिंतामणि छे, ए आनंदरसनो कूवो छे, मोक्षनो उपाय अने पूर्णानंदनी प्राप्तिरूप मोक्ष छे. अहाहा...! अनुभव मोक्षस्वरूप छे. द्रव्य तो त्रिकाळ मुक्तस्वरूप ज छे. एनो अंश जे पर्यायमां द्रव्यना आलंबनथी प्रगटे ए पण मुक्तस्वरूप छे. वळी पर्यायमां द्रव्यनी जे द्रष्टि थाय छे द्रष्टिमां पण द्रव्य मुक्तस्वरूप ज भासे छे.

हवे कहे छे के आ सम्यक्स्वभावनो जगत अनुभव करो के ‘यत्र’ ज्यां ‘अमी बद्धस्पृष्टभावादयः’ आ बद्धस्पृष्टादि भावो ‘एत्य स्फुटं उपरि तरन्तः अपि’ स्पष्टपणे ते स्वभावना उपर तरे छे. आ बद्धस्पृष्टादि पांचे भावो स्पष्टपणे त्रिकाळ ध्रुव, ध्रुव पूर्णज्ञायकभावनी उपर उपर तरे छे तोपण ‘प्रतिष्ठाम् न हि विदधति’ तेमां प्रतिष्ठा पामता नथी, अंदर प्रवेश पामता नथी. कर्मना संबंधरूप बंधभाव, अनेरी अनेरी गतिरूप भाव, ज्ञाननी हीनाधिक दशा के रागादि भावो-ए पर्यायभावो ज्ञायकभावनी उपर उपर रहे छे, अंदर प्रवेश पामता नथी. जेम पाणीना दळनी उपर तेल नाखवामां आवे तो तेल उपर उपर ज रहे छे, अंदर प्रवेश पामतुं नथी, तेलनी चीकाश अंदर जती नथी तेवी रीते अनादि-अनंत सहज विज्ञानघनस्वभावमां दया- दान-पूजा-भक्तिनो राग तो प्रवेश पामतो नथी पण ए रागने जाणनारी ज्ञाननी क्षयोपशमरूप अनियत अवस्था पण अंदरमां प्रवेश पामती नथी. कारण के द्रव्यस्वभाव तो नित्य छे, एकरूप छे अने आ भावो अनित्य अने अनेकरूप छे. आत्मतत्त्व नित्य, ध्रुव, चिदानंदघनस्वभावी, चैतन्यदळ छे. एमां अगियार अंगनो क्षयोपशम हो के अनुभवनी पर्याय हो, ए सर्व उपर उपर रहे छे, अंदर प्रवेश पामती नथी. भाई! आ द्रव्यस्वभावमां पर्यायनी हीनाधिकता प्रवेश न पामे तो स्त्री, पुत्रादि केम पामे? द्रष्टिमां आवा स्वभावनो महिमा आववो जोईए. पोतानो महिमा आव्या विना पर्यायमां जे रागनो महिमा आवे छे ते आत्मजीवननो घात करे छे. ए ज मिथ्यात्व छे.

अहीं प्रश्न थाय छे के-रागनी पर्याय व्यय पामीने अंदर ध्रुवमां भळी जाय छे ने? समाधानः– ना, बिलकुल भळती नथी. रागनो नाश थाय छे त्यारे ते अंदर पारिणामिकभावरूप थई जाय छे. आत्मामां जे वर्तमान राग थाय ते बीजा समये नाश