पामी जाय छे. ते योग्यतारूपे पारिणामिकभावरूप थई जाय छे. पण एम नथी के ते अशुद्धतारूपे द्रव्यमां भळीने रहे छे. पर्यायनी अशुद्धता द्रव्यमां जती नथी. तेवी ज रीते क्षायोपशमिकभाव हो के क्षायिकभावनी पर्याय हो, तेनी स्थिति पण एक समय छे. बीजे समये तेनो व्यय थतां ते पारिणामिकभावरूप थई जाय छे.
औदयिक भाव हो, उपशम हो, क्षयोपशमभाव हो के क्षायिकभाव हो-ए बधी पर्यायोमां सामान्य एक ध्रुवस्वभाव, ज्ञायकभाव, कायम, त्रिकाळ प्रकाशमान छे. पूर्णानंदनो नाथ प्रभु एनी दरेक पर्यायमां ध्रुव, ध्रुव, ध्रुवपणे प्रकाशमान रहे छे. एवा शुद्धस्वभावनो ‘अपगतमोहीभूय’ मोहरहित थईने जगत अनुभव करो. हे जगतना जीवो, मिथ्यात्वरूपी मोहने छोडीने एक ज्ञायकभावनो अनुभव करो; बार अंगनो आ सार छे.
भगवान! तारी पासे आखो आत्मा पडयो छे ने? पासे क्यां? तुं ज ए छे. पर्याय पासे कहेवामां आवे छे. पर्याय ए तुं नथी. पर्यायबुद्धि-अंशबुद्धि-व्यवहारबुद्धि ए तो अज्ञान छे. प्रवचनसार गाथा ९३ मां ‘पज्जयमूढा हि परसमया’ एम कह्यु छे. एक समयनी पर्यायमां मूढ छे ए मिथ्याद्रष्टि छे. स्वरूप जे पूर्ण छे एनो आदर छोडी एक समयनी पर्यायमां दया, दान, व्रत आदिना विकल्पोनो आदर ए मिथ्यात्व छे. ए मिथ्यात्वरूप अज्ञान छे तो जीवनी पर्याय, पण एमां मोहकर्मनो उदय निमित्त छे. (मोहकर्मे करावी नथी) पर्यायमां गमे तेटलो ज्ञाननो उघाड के रागनी मंदता होय, पण एनी रुचि-प्रेम जे छे ए मिथ्यात्व छे. आचार्य कहे छे के मोहकर्मना उदयना निमित्तथी उत्पन्न मिथ्यात्वरूप मोहनो त्याग करीने, पर्यायनी रुचि मटाडीने, पर्यायनी पाछळ जे अखंड एक पूर्ण ध्रुव चैतन्यस्वभाव आत्मा प्रकाशमान रहेलो छे, तेनुं लक्ष करी तेनो अनुभव करो. एम करतां सम्यग्दर्शन छे.
अहाहा...! अतीन्द्रियना आनंदस्वरूप आत्मानी रुचि थतां ईन्द्रना ईन्द्रासनना भोग सडेला कूतरा अने बिलाडा जेवा (अरुचिकर) लागे छे. ज्ञानीने पण ज्यांसधी पूर्ण वीतरागता पर्यायमां प्रगटे नहिं त्यांसुधी शुभ-अशुभ बन्ने राग आवे छे. गृहस्थाश्रममां स्त्री वगेरे अनेक भोगो तेने होय छे; पण ते काळा नाग जेवा, उपसर्ग समान लागे छे. एने एमां होंश, उत्साह नथी. शांतिनाथ, कुंथुनाथ अरनाथ तीर्थंकर हता, साथे चक्रवर्ती पण हता. ९६ हजार राणीओ हती. पण ते प्रत्येना भोगने (रागने) झेर समजता हता. समयसार मोक्ष-अधिकारमां पुण्यभावने झेरनो घडो कह्यो छे.