Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२प२ [ समयसार प्रवचन

भगवान आत्मा अमृतकुंभ छे. आ तो माखण-माखणनी वातो छे. कह्युं छे ने-

‘गगनमंडलमें गौआ विहानी, वसुधा दूध जमाया,
माखन था सो विरला रे पाया, ये जगत छास भरमाया... संतो
अबधु सो जोगी रे मिला, हीनपदका रे करे निवेडा,
ऐसो जोगी गुरु मेरा!’

भाई! आ तो समोसरणमां जगद्गुरु भगवानना मुखेथी नीकळेली सार वात छे. जेनां भाग्य होय तेने सांभळवा मळे. बाकी लोकोने तो पुण्यभाव-शुभभावनी रुचि, पैसा, स्त्री आदिनो प्रेम होवाथी आ वात कठण पडे छे. पण शुं थाय? ज्यां परमस्वभाव ध्रुव चैतन्यभावनी आगळ क्षायिकभाव ए पण अपरमभाव छे (अप्रतिष्ठित छे) त्यां पछी रागनी तो वात ज शी? (रागनी-शुभरागनी कोई प्रतिष्ठा नथी).

* कळश ११ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

अहीं एम उपदेश छे के शुद्धनयना विषयरूप त्रिकाळी आत्मा-पर्यायरहित शुद्धात्मानो अनुभव करो. आनंदकंदमां झूलनारा, वनवासी, नग्न दिगंबर मुनिओ अने आचार्योनो आ उपदेश छे. अने ए ज भगवाननो उपदेश छे. मुनिओ तो जंगलमां रहेता होय छे. क्यारेक भोजन माटे गाममां आवे छे. ए मुनिओ क्यारेक विकल्प ऊठे तो वनमां ताडपत्र उपर शास्त्र लखे छे. त्यां ने त्यां ताडपत्र मूकीने पोते तो बीजे चाल्या जाय छे. कोई गृहस्थने ख्याल होय के मुनि शास्त्र लखी गया छे तो ते लई ले छे. आखुं समयसार आ रीते बन्युं छे. अहाहा...! लखवानुं पण जेने अभिमान नथी अने लखवाना विकल्पना पण जे स्वामी थता नथी एवा मुनि भगवंतोनो आ उपदेश छे के एक शुद्धात्मानो अनुभव करो.

हवे ए ज अर्थनुं कळशरूप काव्य फरीने कहे छे जेमां एम कहे छे के आवो अनुभव कर्ये आत्मदेव प्रगट प्रतिभासमान थाय छेः-

* कळश –१२ श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘यदि’ जो ‘कः अपि सुधीः’ कोई सुबुद्धि कहेतां सम्यग्द्रष्टि जीव ‘भूतम् भान्तम् अभूतम् एव बन्धं’ भूतकाळमां वीती गयेला, वर्तमानमां वर्तता अने भविष्यमां प्रगट थवा योग्य -एम त्रणे काळना पुण्य अने पापना भावोने पोताना आत्माथी ‘रभसात्’