Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २प३

तत्काळ-शीघ्र ‘निर्भिद्य’ भिन्न करीने (जाणीने) -जुओ, अहीं शुं कहे छे? रागथी के पैसा खर्चवाथी धर्म थाय एवी मान्यतावाळानुं धर्ममां कोई स्थान नथी एम कहे छे. थेलामां कडवुं करियातुं भर्युं होय अने उपर नाम लखे साकर तेथी कांई करियातुं साकर न थइ जाय. एम परनी क्रिया अने रागनी क्रिया करे अने नाम धर्मनुं आपे तो ए कांई धर्म न थई जाय. ए तो मिथ्याश्रद्धान छे. सम्यग्द्रष्टि शुभाशुभ बन्ने भावने पोतानाथी भिन्न जाणे छे. ए बन्ने प्रकारना विकल्पोने तत्काळ आत्माथी भिन्न जाणीने तथा ‘मोहं’ ते कर्मना उदयना निमित्तथी थयेल मिथ्यात्व (अज्ञान) ने ‘हठात्’ पोताना बळथी (पुरुषार्थथी) ‘व्याहत्य’ रोकीने-एटले शुभभावथी धर्म थशे एवी मिथ्या मान्यताने पोताना स्वभावना पुरुषार्थ वडे रोकीने -नाश करीने ‘अन्तः’ अंतरंगमां पूर्णानंदनो नाथ छे एनो ‘किल अहो कलयति’ अभ्यास करे- देखे-अनुभव करे, साक्षात्कार करे तो ‘अयम् आत्मा’ आ आत्मा ‘आत्मानुभव–एक गम्य–महिमा’ पोताना अनुभवथी ज जणावायोग्य जेनो प्रगट महिमा छे एवो - देव-गुरु-शास्त्रथी के तेमनी भक्तिना रागथी नहीं, पण पोताना अंतरअनुभवथी ज जणावायोग्य छे एवो- ‘व्यक्तः’ व्यक्त छे. व्यक्त एटले प्रगट छे. एक समयनी पर्यायथी रहित त्रिकाळी वस्तु आत्मा पोतानी अपेक्षाए अनुभवगम्य छे तेथी व्यक्त छे. एक समयनी ज्ञान-वीर्य आदिनी प्रगट-व्यक्त पर्यायनी अपेक्षाए त्रिकाळी वस्तु आत्मा अव्यक्त कही छे. वळी ‘ध्रुवं’ भगवान आत्मा कोईथी चळे नहीं तेवो निश्चल छे, ‘शाश्वतः’ शाश्वत कहेतां उत्पत्ति-विनाशरहित छे. शरीर, कर्म तथा पुण्य-पापना भावथी भिन्न आत्मानो अंतरंगमां अनुभव करे तो आत्मा प्रगटरूप, निश्चल अने शाश्वतरूपे रहेलो छे. वळी ‘नित्यं कर्मकलङ्क–पङ्क–विकल’ नित्य कर्म-कलंक-कर्दमथी रहित छे. द्रव्यस्वभाव, ध्रुवस्वभाव तो अनादि-अनंत कर्मकलंकथी रहित अंदरमां पोते ‘स्वयं देवः’ स्तुति करवा योग्य देव ‘आस्ते’ बिराजमान छे.

आ जे भगवान थई गया तेमनी के स्वर्गना देवनी वात नथी. आ तो पोते स्वयं देव छे एनी वात छे. देहदेवळमां देहथी भिन्न पवित्र महाचैतन्यसत्ता अंदर परमात्मस्वरूपे नित्य बिराजमान छे. परमात्मस्वरूपे न होय तो प्रगट थाय कयांथी? आत्मा स्वयं परमात्मस्वरूप देव छे. पण अरे! ‘नजरनी आळसे रे, नयणे न नीरख्या हरि.’ -नजरनी आळसमां अंदर आखो भगवान छे ते देखातो नथी, अंदरनुं निधान देखातुं नथी. नजरने (पर्याय उपरथी खसेडी) अंतरमां वाळीने अनुभव करे तो आत्मदेवनां दर्शन थया विना रहे नहीं. चोथा गुणस्थाने सम्यग्द्रष्टिने आवो आत्मा अनुभवमां आवे छे. पांचमे श्रावक अने छठ्ठे-सातमे झूलनारा संतनी (मुनिराजनी) वात तो अलौकिक छे.