शुद्धनयनी द्रष्टिथी जोवामां आवे तो सर्व कर्मोथी रहित, अविनाशी चैतन्यमात्र देव अंतरंगमां पोते विराजी रह्यो छे. ज्ञानीओ कहे छे अत्यारे -हमणां ज शुद्धनयथी आत्माने जोवामां आवे तो ज्ञानस्वभावमात्र आत्मा-ज्ञान, शांति, आनंद, स्वच्छता, प्रभुता एवी अनंत शक्तिओनी दिव्यताने धारण करनार देव अंतरंगमां विराजी रह्यो छे. आ तीर्थंकरदेवनी वात नथी. आ तो तीर्थंकरगोत्र जे भावथी बंधाय ए भाव पण जेमां नथी एवा त्रिकाळी शुद्ध आत्मदेवनी वात छे. तीर्थंकरगोत्र जे भावथी बंधाय ए भाव धर्म नथी, ए बंधभाव छे. जे भावथी बंधन पडे ते धर्म नहीं. सीधी स्वतंत्र छे. त्रणे कडक भाषामां कहीए तो ए अधर्म छे. जगतथी जुदी वात छे. माने न माने, जगत काळ परमार्थनो मार्ग तो एक ज छे. चैतन्यनो पुंज चिदानंदघन अनंतशक्तिनो सागर आत्मा स्तुति करवा लायक स्वयं देव छे. वर्तमान अवस्थानी जेने द्रष्टि छे एवो अज्ञानी पर्यायबुद्धि बहिरात्मा जीव एने बहार ढूंढे छे ए मोटुं अज्ञान छे.
पंडित बनारसीदासजी गृहस्थ हता, महा ज्ञानी हता, वस्तुस्थितिना जाणकार हता. एमणे समयसार नाटकना बंधद्वारमां आ अंगे सुंदर वात लखी छे. कहे छेः-
आत्माने जाणवा माटे अर्थात् ईश्वरनी खोज करवा माटे कोई तो त्यागी बनी गया छे, कोई बीजा क्षेत्रमां यात्रा आदि माटे जाय छे, कोई प्रतिमा बनावीने नमस्कार, पूजन करे छे, कोई डोळीमां बेसीने पर्वत उपर चढे छे, कोई कहे छे ईश्वर आकाशमां छे, अने कोई कहे छे के पाताळमां छे. परंतु पंडितजी कहे छे के मारो प्रभु माराथी दूर नथी, मारामां ज छे, अने मने सारी पेठे अनुभवमां आवे छे.
चैतन्यचमत्कार अविनाशी आत्मदेव अंतरंगमां विराजमान छे. एने अज्ञानी शत्रुंजय, गिरनार अने सम्मेदशिखरमां मळी जशे एम बहार शोधे छे. जाणे प्रतिमाना पूजनथी मळी जशे एम मानी पूजा आदि करे छे. पण ए तो बहारना (पर) भगवान छे. ए क्यां तारो भगवान छे? तारो भगवान तो सच्चिदानंद प्रभु अंतरंगमां