परंतु हवे त्यां, सामान्य ज्ञानना आविर्भाव अने विशेष ज्ञानना तिरोभावथी ज्यारे ज्ञानमात्रनो अनुभव करवामां आवे त्यारे ज्ञान प्रगट अनुभववामां आवे छे. जुओ रागमिश्रित ज्ञेयाकार ज्ञान जे (पूर्वे) हतुं एनी रुचि छोडी दईने (पर्यायबुद्धि छोडीने) अने ज्ञायकनी रुचिनुं परिणमन करीने सामान्य ज्ञाननो पर्यायमां अनुभव करवो एने सामान्य ज्ञाननो आविर्भाव अने विशेष ज्ञाननो तिरोभाव कहे छे. आ पर्यायनी वात छे ज्ञाननी पर्यायमां एकला ज्ञान, ज्ञान, ज्ञाननुं वेदन थवुं अने शुभाशुभ ज्ञेयाकार ज्ञाननुं ढंकाई जवुं तेने सामान्य ज्ञाननो आविर्भाव अने विशेष ज्ञेयाकार ज्ञाननो तिरोभाव कहे छे. अने ए प्रमाणे ज्ञानमात्रनो अनुभव करवामां आवतां ज्ञान आनंद सहित पर्यायमां अनुभवमां आवे छे. अहीं ‘सामान्य ज्ञाननो आविर्भाव’ एटले त्रिकाळी भावनो आविर्भाव एम वात नथी. सामान्य ज्ञान एटले शुभाशुभ ज्ञेयाकार रहित एकला ज्ञाननुं पर्यायमां प्रगटपणुं. एकला ज्ञान, ज्ञान, ज्ञाननो अनुभव ए सामान्य ज्ञाननो आविर्भाव छे. ज्ञेयाकार सिवायनुं एकलुं प्रगट ज्ञान ते सामान्य ज्ञान छे. एनो विषय त्रिकाळी छे.
भाई! आ तो अध्यात्म कथनी छे. एक-एक शब्दमां गंभीरता भरी छे. आ तो समयसार अने तेमां पंदरमी गाथा! कुंदकुंदाचार्यनी वाणी समजवा माटे पण खूब पात्रता जोईए.
तोपण जेओ अज्ञानी छे, ज्ञेयोमां आसक्त छे तेमने ते स्वादमां आवतुं नथी. चैतन्यस्वरूप निज परमात्मानी जेमने रुचि नथी एवा अज्ञानी जीवो राग के जे परज्ञेय छे (राग ते ज्ञान नथी) तेमां आसक्त छे. व्रत, तप, दया, दान, पूजा, भक्ति एवा जे व्यवहार रत्नत्रयना परिणाम छे तेमां जेओ आसक्त छे, शुभाशुभ विकल्पोने जाणवामां जेओ रोकायेला छे एवा ज्ञेयलुब्ध जीवो्रने आत्माना अतीन्द्रिय ज्ञान अने आनंदनो स्वाद आवतो नथी. शुभरागनी -पुण्यभावनी जेमने रुचि छे तेमने आत्माना आनंदनो स्वाद आवतो नथी.
आत्मानो वळी स्वाद केवो हशे? दाळ, भात, लाडु, मोसंबी वगेरेनो स्वाद तो होय छे! ए तो बधी जड वस्तु छे. जडनो स्वाद तो अज्ञानीने पण होतो नथी. पोताना द्रव्य-गुण-पर्यायनी सत्ता छोडीने पदार्थ शुं बीजी सत्तामां मळी जाय छे? जड तो भिन्न चीज छे. अज्ञानीने वस्तु प्रत्ये जे राग छे तेनो स्वाद आवे छे, वस्तुनो नहीं. स्त्रीना विषयमां स्त्रीना शरीरने भोगवतो नथी, पण तेना प्रत्येना रागनुं वेदन-अनुभव करे छे. पैसा के आबरूमां कांई पैसानो के आबरूनो अनुभव आवतो नथी. तीखुं मरचुं