मोढामां मूकतां तीखाशनो स्वाद आवतो नथी. परंतु तीखाश जाणतां आ ठीक छे एवी मान्यतानो जे राग उत्पन्न थाय छे ए रागनो अज्ञानी स्वाद ले छे. एवी रीते शरीरमां ताव आवे छे ए तावनो अनुभव आत्माने नथी, मात्र ए अठीक छे एवी अरुचि थतां दुःखनो अनुभव छे. वस्तु प्रत्ये रागमां आसक्त अज्ञानी जीवने रागनो स्वाद आवे छे, अने ते आकुळतामय छे, अधर्म छे. आत्मानो स्वाद तो अनाकुळ आनंदमय छे. बनारसीदासे लख्युं छेः- “वस्तु विचारत
वस्तु जे ज्ञायकस्वरूप तेने ज्ञानमां लई अंतरमां ध्यान करे छे तेने मनना विकल्पो-राग विश्राम पामे छे, हठी जाय छे. मन शांत थई जाय छे. त्यारे अतीन्द्रिय आनंदना रसनो स्वाद आवे छे. परिणाम अंतर्निमग्न थतां अनाकुळ सुखनो स्वाद आवे छे तेने अनुभव अर्थात् जैनशासन कहे छे. ज्ञेयमां आसक्त छे ते ईन्द्रियना विषयोमां आसक्त छे. जे पदार्थो ईन्द्रियो वडे जाणवामां आवे छे ते इन्द्रियना विषयो छे. देव, गुरु, शास्त्र, साक्षात् भगवान अने भगवाननी वाणी ए पण ईन्द्रियना विषयो छे. समयसार गाथा ३१ मां लीधुं छे के- ‘जीती ईन्द्रियो ज्ञानस्वभावे अधिक जाणे आत्मने’- पांच द्रव्येन्द्रियो, भावेन्द्रियो अने ईन्द्रियोना विषयभूत पदार्थो-त्रणेने ईन्द्रिय गणवामां आवी छे. ए त्रणेयने जीतीने एटले के तेमना तरफनो झुकाव-रुचिने छोडीने एनाथी अधिक अर्थात् भिन्न पोताना ज्ञानस्वभावने -अतीन्द्रिय भगवानने अनुभवे छे ते जैनशासन छे. पोताना स्वज्ञेयमां लीन छे एवी आ अनुभूति- शुद्धोपयोगरूप परिणति ते जैनशासन छे. आथी विरुद्ध अज्ञानीने परिपूर्ण जे स्वज्ञेय छे एनी अरुचि छे अने ईन्द्रियादिनुं खंडखंड जे ज्ञेयाकार ज्ञान छे एनी रुचि अने प्रीति छे. ते परज्ञेयोमां आसक्त छे अने तेथी तेने ज्ञाननो स्वाद न आवतां रागनो-आकुळतानो स्वाद आवे छे. रागनो स्वाद, रागनुं वेदन अनुभवमां आववुं ए जैनशासनथी विरुद्ध छे तेथी अधर्म छे. शुभक्रिया करवी अने ए करतां करतां धर्म थई जशे एवी मान्यता मिथ्याभाव छे तथा शुभाशुभ रागथी भिन्न अंतर आनंदकंद भगवान आत्माने ज्ञेय बनावी ज्ञायकना ज्ञाननुं वेदन करवुं ए जिनशासन छे, धर्म छे. आ वात द्रष्टांतथी समजाववामां आवे छेः- ‘जेम अनेक तरेहनां शाक आदि भोजनोना संबंधथी उपजेल सामान्य लवणना तिरोभाव अने विशेष लवणना आविर्भावथी अनुभवमां आवतुं जे लवण तेनो स्वाद