अज्ञानी शाकना लोलुप मनुष्योने आवे छे पण अन्यना संबंधरहितपणाथी उपजेल सामान्यना आविर्भाव अने विशेषना तिरोभावथी अनुभवमां आवतुं जे एकाकार अभेदरूप लवण तेनो स्वाद आवतो नथी. शुं कहे छे? दूधी, तुरियां, कारेलां आदि शाकमां तथा खीचडी, रोटला आदि पदार्थोमां मीठुं नाखवामां आवे छे. तो ते ते पदार्थोना संबंधथी मीठानो लवणनो स्वाद लेवामां आवतां सामान्य लवणनो स्वाद तिरोभूत एटले ढंकाई जाय छे, अने शाक खारुं छे एवी अनुभूति थाय छे. खरेखर खारुं तो लवण छे, शाक नहीं. तथा शाक आदि द्वारा भेदरूप लवणनो स्वाद आववो (जेमके शाक खारुं छे) ए विशेषनो आविर्भाव छे. शाकना लोलुपी-गृद्धिवाळा मनुष्योने लवण द्वारा लवणनो स्वाद एकाकार अभेदरूप लवणनो स्वाद (मीठुं खारुं छे एवो) आवतो नथी.
‘वळी परमार्थथी जोवामां आवे तो तो, जे विशेषना आविर्भावथी अनुभवमां आवतुं (क्षाररसरूप) लवण छे ते ज सामान्यना आविर्भावथी अनुभवमां आवतुं (क्षाररसरूप) लवण छे.’ परमार्थथी जोवामां आवे तो शाकना लोलुपी जीवोने विशेषनो आविर्भाव एटले के शाक द्वारा जे लवणनो स्वाद आवे छे (स्वाद तो ते तरफना लक्षवाळा रागनो छे पण आ तो समजाववा माटेनुं द्रष्टांत छे) ए खरेखर सामान्य लवणनुं ज विशेष छे, एनो ज भाव छे, शाकनुं खारापणुं (विशेष) नथी; अने ए विशेषपणुं शाक द्वारा आव्युं छे एम पण नथी. सामान्य लवणनो ज विशेष स्वाद छे. अज्ञानीने शाकना संयोगथी लवणनो ख्याल आवे छे ए विपरीत छे, केमके तेने मीठाना स्वभावनो ख्याल नथी आवतो आ द्रष्टांत थयुं.
सिद्धांतः– ‘एवी रीते अनेक प्रकारना ज्ञेयोना आकारो साथे मिश्ररूपपणाथी उपजेल सामान्यना तिरोभाव अने विशेषना आविर्भावथी अनुभवमां आवतुं जे (विशेषभावरूप, भेदरूप अनेकाकाररूप) ज्ञान ते अज्ञानी ज्ञेयलुब्ध जीवोने स्वादमां आवे छे पण अन्य ज्ञेयाकारना संयोगरहितपणाथी उपजेल सामान्यना आविर्भाव अने विशेषना तिरोभावथी अनुभवमां आवतुं जे एकाकार अभेदरूप ज्ञान ते स्वादमां आवतुं नथी.’ शुं कहे छे? स्त्री, दीकरा, दीकरी, भगवान, भगवाननी वाणी, पुण्य, पाप, राग, ईत्यादि अनेक प्रकारना ज्ञेयो छे. आ ज्ञेयोना आकारो साथे मिश्ररूपपणाथी उत्पन्न सामान्यनो तिरोभाव-एटले एकला ज्ञानना अनुभवनुं ढंकाई जवुं तथा विशेषनो आविर्भाव एटले ज्ञेयता संबंधथी ज्ञाननुं प्रगट थवुं -आ वडे राग आदि द्वारा जे ज्ञेयमिश्रित ज्ञाननो अनुभव थाय ते अज्ञान छे, तेमां आत्मानो स्वाद आवतो नथी. राग द्वारा ज्ञाननो ज्ञेयाकार विशेष ए खरेखर तो सामान्य ज्ञाननी अवस्था छे, पण माने छे (भ्रमथी) के