रागनी अवस्थाने लईने ज्ञान थयुं. आ मान्यता ए मिथ्यात्व छे अने दुःखनुं वेदन छे. पुण्य अने पापना विकल्प जे ज्ञेय छे ए उपर जेनी द्रष्टि छे, एमां जेने आसक्ति छे एने जे ज्ञेय द्वारा ज्ञाननो स्वाद आवे छे ए दुःखनो -आकुळतानो स्वाद छे. जेम अज्ञानी शाकना लोलुपीने शाकद्वारा लवणनो स्वाद आवे छे ते मिथ्या छे तेम आ ज्ञेयलुब्ध जीवोने दया, दान, आदि पुण्य अने क्रोध, मान आदि पापना विकल्पो जे परज्ञेय छे, आत्माथी भिन्न छे, ए द्वारा रागनी पर्याय अने ज्ञाननी पर्यायनो मिश्रित अनुभव थतां जे स्वाद आवे छे ए दुःखनो स्वाद छे, विपरीत छे, झेरनो स्वाद छे, केमके एमां आत्माना सामान्यज्ञाननो अनुभव ढंकाई गयो छे.
राग द्वारा ज्ञाननुं वेदन ए धर्म नथी. ज्ञाननुं ज्ञान द्वारा एकलुं वेदन ए धर्म छे. आ धर्म अने अधर्मनी व्याख्या छे. ज्ञेयाकार ज्ञाननो अनुभव करे तो मिथ्यात्व सहित दुःखनुं वेदन छे. आ शास्त्र-स्वाध्याय थाय छे ने, ए पण विकल्प छे. ए विकल्प द्वारा ज्ञाननो अनुभव थयो ए अधर्म छे. अज्ञानी जीवने रागमिश्रित ज्ञाननुं ढंकाई जवुं अने ज्ञानभावथी ज्ञान अनुभवमां आववुं एवा एकाकार ज्ञानना स्वादनो अनुभव आवतो नथी. अहाहा! आत्मा तो वीतराग स्वभावनो पटारो छे, वीतरागस्वरूप ज छे. एना तरफना झुकावथी एकला ज्ञाननो जे अनुभव आवे ते आत्मानो -अतीन्द्रिय ज्ञान अने आनंदनो स्वाद छे. ते धर्म छे.
‘वळी परमार्थथी विचारीए तो तो, जे ज्ञान विशेषना आविर्भावथी अनुभवमां आवे छे ते ज ज्ञान सामान्यना आविर्भावथी अनुभवमां आवे छे.’ ज्ञायक उपर जेनी द्रष्टि छे ए तो जाणे छे के आ ज्ञाननुं विशेष ज्ञान सामान्यमांथी आवे छे. ज्ञायक उपर द्रष्टि पडतां ज्ञाननी पर्यायनुं वेदन आवे छे. (रागनुं नहीं, रागथी नहीं) राग द्वारा ज्ञाननो अनुभव खरेखर तो सामान्यनुं विशेष छे, छतां अज्ञानी माने छे के ए रागनुं विशेष छे. ए द्रष्टिनो फेर छे. समयसार गाथा १७, १८ मां आवे छे के - आबालगोपाळ सर्वने राग, शरीर, वाणी, जे काळे देखाय छे ते काळे खरेखर ज्ञाननी पर्याय जाणवामां आवे छे, पण एवुं न मानतां मने आ जाणवामां आव्युं, राग जाणवामां आव्यो ए मान्यता विपरीत छे. एवी रीते ज्ञानपर्याय छे तो सामान्यनुं विशेष, पण ज्ञेय द्वारा ज्ञान थतां (ज्ञेयाकार ज्ञान थतां) अज्ञानीने भ्रम थई जाय छे के आ ज्ञेयनुं विशेष छे, ज्ञेयनुं ज्ञान छे. खरेखर जे ज्ञानपर्याय छे ते सामान्य ज्ञाननुं ज ज्ञान-विशेष छे, परज्ञेयनुं ज्ञान नथी, परज्ञेयथी पण नथी.