Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 349 of 4199

 

६८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२

पहेलां कह्युं ने के-में उपदेश कर्यो हतो एनाथी बधा समज्या अने मारा उपदेशनुं आ फळ आव्युं-आवा जूठा विकल्पथी अज्ञानी अप्रतिबुद्ध ओळखाय छे, पहेलां दलपतरामनी कवितामां आवतुं के “मूरख माथे शींगडां नहि, ” तो जेम आ मूरखने एवी कोई निशानी होती नथी एम अज्ञानीने बहारमां एवां कोई चिह्न होता नथी पण परद्रव्यने पोतानुं मानवुं अने पोताने परद्रव्यरूप मानवुं ए अज्ञानीनुं चिह्न अंदरमां छे.

अहीं तो भगवान आत्मा खरेखर सर्वज्ञस्वभावी छे एम सिद्ध करवुं छे. ते भूतकाळनी चीज जाणे, वर्तमान छे एने जाणे, भविष्यमां थशे एने जाणे. जाणे, जाणे अने जाणे-ए सिवाय बीजुं एनामां छे नहि. बीजी रीते कहीए तो ज्ञाता-द्रष्टा एनो स्वभाव छे, देखनार-जाणनार बस. ए वस्तुना भूत, वर्तमान अने भविष्यने जाणे ए जुदी वात. पण ते वस्तु हती माटे जाणे एम नथी. ए समयनी स्वपरप्रकाशक ज्ञाननी पर्याय पोताथी प्रगटी एने जाणे छे.

बंध अधिकारमां त्यां सुधी लीधुं छे के-आने में मोक्ष पमाडयो, हुं आने मोक्ष पमाडुं, हुं आने बंध करावुं एवी मान्यता मिथ्याबुद्धि छे. भाई, एना अज्ञान अने राग विना एने बंध नहि थाय. अने वीतरागता विना एने मुक्ति नहि थाय. (तारा विना नहि थाय एम नहीं.) हुं आने आजीविका दईने जीवाडुं, हुं आने मारुं, हुं आने सुखना संयोगो दउं, हुं आने दुःखना संयोगो दउं-ए बधी मान्यता मिथ्याद्रष्टि मूढ अप्रतिबुद्धनी छे. त्यां दलील आपी छे के जीवनी वीतराग दशा विना ए मुक्ति नहि पामे, तो तुं पमाडीश ए कयां आव्युं? अने अज्ञान अने रागभाव विना जीवने बंध नहि थाय एटले आने हुं बंध करावुं ए वात कयां रही?

श्वेतांबरमां एक कथा आवे छे. देवद्रव्य खाय तो खानारने नुकशान थाय-पाप थाय, एना उपर एक एवी कथा छे. बे जण हता. एक बीजानो वैरी हतो. हवे जेना पर वेर हतुं एनुं मकान थतुं हतुं. तेमां पेला वैरीए देरासरनी इंट लईने मकान थतुं हतुं एमां मूकी दीधी. एणे वेर वाळवा आम कर्युं. एने मन एम के हवे पेला वैरीने देवद्रव्य खाधानुं पाप लागशे अने एनुं नख्खोद जशे. पण भाई, जेनुं मकान थतुं हतुं एने पोताने तो इंटनी खबरेय नथी तो पछी एने पाप लागे अने एनुं नख्खोद जाय एम शी रीते बने? न बने. पण अज्ञानी आवुं अनादिथी मानी रह्यो छे. वळी कोई एम माने छे के आपणे लाख बे लाखनुं जे मंदिर बंधावीए तेमां जे लोको भक्ति, पूजा, धर्म करे एनो (पुण्य) लाभ आपणने मळशे. आ तद्न खोटी वात छे. (अज्ञानीओ आवुं ने आवुं केटलुंय मानतां होय छे.) अहीं तो कहे छे के हुं आनो अने आ मारां एम त्रणेकाळ संबंधी राग, शरीर, वाणी, पैसा, लक्ष्मी, घर, दीकरा, दीकरी, देश इत्यादि ए बधा बोल लागु पाडतां जे आ प्रकारे जूठा विकल्पो करे छे ते अज्ञानी- अप्रतिबुद्ध छे.