७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ एटले मारी दुकान बराबर चाले छे-एम कहे छे, पण ए वात तद्न खोटी छे. पोतानी चीज शुं छे ए जाण्या वगर मिथ्या अभिमान सेवे पण एथी शुं? प्रभु! तुं तो सर्वज्ञनेत्र छे; सौने जाणे खरो; पण ए सर्वमांथी कोई पण चीज पोतापणे छे एम नथी.
‘हुं आ परद्रव्य नथी’ एमां हुं छुं अने बीजां द्रव्यो, रागादि वगेरे छे एम (बन्नेनुं अस्तित्व) सिद्ध कर्युं. पण ए परद्रव्यो, राग, व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प अने एनुं फळ जे स्वर्गादि ए मारुं स्वरूप नथी. अहाहा! छ खंडनो स्वामी चक्रवर्ती समक्ति पामे त्यारे कहे के आ (छ खंडनो वैभव) हुं नथी. आ तो बधुं एनी मेळे थाय छे. हुं छ खंड साधतो नथी, हुं तो अखंडने (निज स्वरूपने) साधुं छुं. छ खंडनो हुं स्वामी नहि, हुं तो अखंडस्वरूपनो स्वामी छुं. न्यालभाईए द्रव्यद्रष्टिप्रकाशमां लीधुं छे के-कोईए कह्युं के चक्रवर्ती छ खंडने साधता हता तो कह्युं के भाई, एम नहोतुं. ए तो समक्तिी हता एटले अखंडने साधता हता. छ खंडने नहि पण जे ज्ञायकस्वरूपी अखंड एक आनंदनो नाथ भगवान आत्मा तेने साधता हता. भाई, आ तो वस्तु अंदर कोई अलौकिक छे. आ सामान्य वात थई.
हवे वर्तमानः-मारुं आ परद्रव्य नथी, आ परद्रव्यनो हुं नथी. आ अत्यारे जे रागादि छे ते मारां नथी, शरीर, मन, वाणी, कुटुंब, देश इत्यादि मारां नथी. ए परद्रव्योनो हुं नथी. मारो ज हुं छुं. सर्वज्ञ-स्वभावी जे अखंड चीज ए ज हुं छुं. परद्रव्य परद्रव्यरूप ज छे. व्यवहार रत्नत्रयनो जे राग आवे तेनाथी एकरूप हुं नथी, अने ए मारो नथी. फक्त ते संबंधीनुं ज्ञान ते मारुं छे. अहाहा! संतोए करुणा करी केवी टीका करी छे! सामाने गळे उतरी जाय एवो गरभलो (तैयार कोळियो) करीने मोढांमां आप्यो छे. भाई, तुं वर्तमानमां पण सर्वज्ञस्वभावी आत्मा ज छे ने, नाथ! ए परवस्तुनो तुं नथी अने परवस्तु तारी नथी.
हवे भूतकाळः-आ परद्रव्य मारुं पहेलां हतुं नहि, आ परद्रव्यनो हुं पहेलां हतो नहि. अरे, पहेलां मारुं शरीर सारुं हतुं पण हमणां हमणां बगडी गयुं छे. कोई वळी एम कहेतो हतो के आ स्त्री एवी छप्परपगी (खराब पगलांनी) मळी के आवी त्यारथी बधी लक्ष्मी चाली गई. तो एक जण वळी एम कहेतो हतो के आ बाई मारे घेर कंकुपगलांनी आवी के आवी त्यारथी अढळक पैसो थई गयो. आवा गांडा छे बधा. आ शरीर, पगलां, अने पैसो आत्मानां कयारे हतां? आ तो बधुं (अज्ञाननुं) तोफान छे. खबर छे ने बधी, नाटक तो बधुं जोयुं छे, नाच्या नथी पण नाचनारने जोया छे. वळी कोई कहे-आ नोकर पहेलां तो वफादार हतो, हवे फरी गयो छे; आ छोकरां पहेलां पहेलां कह्यागरा हता, पण हवे कोण जाणे शुं थयुं छे के मानता ज नथी,