गाथा २०-२१-२२ ] [ ७१ परण्या पछी बायडीना थई गया; इत्यादि केटलाक वातो करे छे. अरे! सांभळने बापु! अहीं कहे छे के पहेलां मारुं कोई हतुं ज नहि, मारुं हतुं एक सर्वज्ञस्वरूप. ते तो हुं छुं ज. अने परद्रव्य परद्रव्य ज हतुं.
हवे भविष्यकाळः आ परद्रव्य मारुं भविष्यमां थशे नहि अने एनो हुं भविष्यमां थईश नहि. ए रागनो, शरीरनो के देशनो हुं थईश नहि. कोईनो दीकरो अने कोईकनो बाप हुं भविष्यमां थईश नहि. हुं मारो ज भविष्यमां थईश. अस्ति- नास्ति कहे छे ने? अने आ परद्रव्यनुं परद्रव्य ज भविष्यमां थशे.
आवो जे त्रणेकाळ संबंधीनो स्वद्रव्यमां ज सत्यार्थ आत्मविकल्प थाय छे ते ज प्रतिबुद्धनुं लक्षण छे, तेनाथी ते ओळखाय छे. जुओ भाषा. एक ज्ञायकभाव सर्वज्ञस्वभावी आत्मा ए ज हुं छुं एवो सत्यार्थ-भूतार्थ आत्मविकल्प ए ज ज्ञानी समक्तिीनुं लक्षण छे. आ रीते ज्ञानी ओळखाय छे. बाकी आ मारां ने ए तारां, में आम कर्युं हतुं. अने तें आम कर्युं, तमे उपकार भूली गया आदि बधुं गांडपण छे, अज्ञान छे.
जे परद्रव्यमां आत्मानो विकल्प करे ते तो अज्ञानी छे, अने जे पोताना आत्माने ज पोतानो माने छे ते ज्ञानी छे-एम अग्नि-इंधनना द्रष्टांत द्वारा द्रढ कर्युं छे. (आ भावार्थ थयो.)
हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
जगतना जीवोने उद्देशीने कह्युं छे के ‘जगत्’ जगतना जीवो ‘आजन्मलीढं मोहम्’ अनादि संसारथी मांडीने आज सुधी अनुभव करेला मोहने ‘इदानीम् त्यजतु’ हवे तो छोडो. एटले के अनादिकाळथी भगवान आत्मानो आनंद अने शांत स्वभाव होवा छतां तेणे राग-द्वेष अने पुण्य-पापना भावने ज वेद्या छे. अनादिथी दया, दान, व्रत, भक्ति, काम, क्रोधादि भावोमां जे मोहपरमां मारापणाना भाव, परमां सावधानीना भाव जे अधर्मरूप छे ते ज एणे वेद्या छे. परंतु पोते जे अतीन्द्रिय ज्ञान अने आनंदस्वरूप भगवान आत्मा छे तेने वेद्यो नथी.
आ खावुं, पीवुं अने वेपार करवो इत्यादिमां जे बाह्य क्रिया थाय छे ए तो एणे करी नथी. ए काळे जे राग-द्वेषना भाव थाय ते एणे कर्या अने अनुभव्या-वेद्या छे. चोवीसे कलाक आ धंधापाणी इत्यादि बधी प्रवृत्ति देखाय छे ने-एमां ए परनुं कांई करतो नथी, करी शक्तो नथी. अनादिकाळथी स्वरूपना स्वादथी जे विरुद्धभाव एवा राग अने द्वेष, शुभ अने अशुभ एम विकृतभाव एणे कर्या अने वेद्या छे. परने तो ए वेदी शक्तो नथी अने आत्माने एणे अनुभव्यो नथी.