Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२

पोताना आत्मानुं वास्तविक स्वरूप तो ज्ञाता-द्रष्टा छे. ए स्वरूपने भूलीने आ पुण्य-पाप मारां, आ शरीर मारुं, आ लक्ष्मी, स्त्री, कुटुंब आदि मारां एवी मान्यतामां करेलो मिथ्यात्वभाव अने अनुकूळ-प्रतिकूळमां करेला राग-द्वेष-एनो ज अनादिथी अनंतकाळ अनुभव कर्यो छे. मोटो दिगंबर साधु थईने अनंतवार नवमी ग्रैवेयके गयो तोपण भगवान! तें मोह अने राग-द्वेषने ज वेद्या छे. आटली वात करीने कहे छे इदानीम् हवे तो आ मोहने छोडो. स्वपदार्थना ध्येयने भूलीने, परपदार्थने ध्येय बनावी जे राग-द्वेषनुं अनादिथी वेदन छे तेने हवे छोडीने भगवान आनंदना नाथ प्रभु आत्माने विषय-ध्येय बनावो.

भगवान अतीन्द्रिय आनंदनो नाथ अंदर विराजे छे. तेने भूलीने अनादि संसारथी एटले निगोदथी मांडीने एकेन्द्रिय, बेईन्द्रिय, त्रणईन्द्रिय, चौरेन्द्रिय अने पंचेन्द्रियना, नारकी, तिर्यंच, देव तेमज मनुष्यना जे अनंत भव कर्या तेमां आ परद्रव्य मारा एम परने पोतानां मान्यां छे. पोतानी चीजनी संभाळ करवाने बदले परद्रव्यनी संभाळ करवामां रोकाई गयो छे. एथी हे भाई! तुं दुःखी छे. तो हवे ए परद्रव्य प्रत्येना मोहने छोड. जे राग-द्वेष मारा मानीने ग्रह्या हता, वेद्या हता तेनुं लक्ष छोडीने भगवान आनंदनो नाथ प्रभु आत्मा छे एनुं लक्ष कर. जुओ, आ धर्मनी रीत. दया, दान, व्रत करवां ए कोई धर्मनी रीत नथी. ए तो विकल्प छे. ए तो रागनुं वेदन छे. (अनादिथी करी रह्यो छे) तो हवे वर्तमानमां गुलांट खा एम कहे छे. तें जे राग-द्वेष अने पुण्य-पापने ध्येय बनावीने एनुं वेदन कर्युं छे एमां ‘ते हुं छुं’ एम मानीने वेदन कर्युं छे तो हवे ‘ते हुं नहि, पण हुं तो ज्ञाताद्रष्टा चेतन छुं’ एम अंतरनी पर्यायमां-ध्यानमां त्रिकाळीने ध्येय बनाव. आ धर्म छे, भाई! आवो केवो धर्म? आटलां देरासर (मंदिर) बंधाववां के आटला उपवास करवा एम कहो तो झट समजाई जाय. देरासर कोण बंधावे, भाई? ए वखते एवो ते संबंधी राग थाय. उपवास करवानो विकल्प पण राग ज छे. अरे! अनादिथी पोताने भूलीने आवा राग कर्या विनानो एक पण समय गयो नथी. तो हवे ए मोहने छोड. ए छोडीने शुं करवुं? तेथी शुं थाय? ए वात हवे कहे छेः-

रसिकानाम् रोचनम् रसिक जनोने रुचिकर उद्यत् ज्ञानम् उद्रय थई रहेलुं जे ज्ञान रसयतु तेने आस्वादो. आत्माना अतीन्द्रिय आनंदना जे रसिकजनो छे. ए सम्यग्द्रष्टि धर्मी रसिकजनोने आत्माना अतीन्द्रिय आनंदना स्वादनी रुचि छे. सम्यग्द्रष्टि निज शुद्ध द्रव्यनी रुचि करीने शक्तिमां जे आनंद रस छे ते पर्यायमां प्रगट करीने आत्माना आनंदनो स्वाद ले छे. एने पुण्य-पाप भावनी रुचि नथी. एने पुण्य-पाप बंधनी के तेना फळनी पण रुचि नथी. एने रुचिकर छे एकमात्र आत्माना आनंदनो स्वाद. अहीं कहे छे के एवा अतीन्द्रिय आनंदना स्वादने आस्वादो.