गाथा २०-२१-२२ ] [ ७३
अहीं एम नथी कह्युं के पहेलो व्यवहार करजे अने आम करजे तेम करजे, केम के व्यवहार तो राग छे, ए तो अनंतवार कर्यो छे. एनी रुचि तो अनादिनी छे. अहीं तो सीधी वात करी छे के ‘त्यजतु इदानीम्’ हवे तो छोडो. एटले रागादि व्यवहारना लक्षने छोडो अने त्रिकाळी भगवान जे अंदर बिराजे छे एनुं लक्ष करो. रसिकजनोने रुचिकर एवो जे भगवान आत्मा-एने ज्ञान कहो, आनंद कहो, ज्ञायक कहो-एना स्वादनी रुचि करो. पहेलां जे रागना वेदननी रुचि हती ए तो मिथ्यादर्शन हतुं. तेथी हवे आत्माना आनंदनी रुचि करो, केम के भगवान आनंदघनस्वभावना स्वादनी रुचि करे ते सम्यग्द्रष्टि छे. ‘रसिकानाम् रोचनं उद्यत् ज्ञानम्’ सम्यग्द्रष्टि-धर्मी ज्ञाननो जे उद्रय-प्रगट द्रशा एनो स्वाद ले छे. ए एने रुचिकर छे. पहेलां ए राग-द्वेषनो स्वाद लेतो हतो ते तो परने लक्ष-ध्येय बनावी लेतो हतो. रसिकजनोने ध्येय तो चैतन्यतत्त्व छे. तेथी कहे छे के ए चैतन्यतत्त्वना लक्षे प्रगट थतुं ज्ञान जे स्वभावरूप छे (आनंद सहित छे) एनो स्वाद लो अने रागनी रुचि छोडो. भाई! आटला शब्दोमां तो घणुं भर्युं छे.
अहाहा! शुभभाव पण धर्मीने ज्ञाताना ज्ञाननुं पर ज्ञेय छे. ए वडे पुण्यबंध थाय ए पण ज्ञातानुं ज्ञेय छे अने एनुं फळ जे स्वर्गादि मळे ए पण ज्ञातानुं ज्ञेय छे. ए स्वज्ञेय नहि, हो. एवी रीते धर्मीने पापना परिणाम होय ए ज्ञातानुं ज्ञेय छे, एनाथी पापबंध थाय ए पण ज्ञातानुं ज्ञेय छे अने एना फळमां जे (नरकादिना) प्रतिकूळ संयोगो मळे ए पण ज्ञातानुं ज्ञेय छे. ए बधुं शुभ अने अशुभ ज्ञातानुं परज्ञेय छे. सवारमां कह्युं हतुं ने के व्रतना परिणामथी जीवने स्वर्गमां स्त्रीओ मळे, सुख (वैभव) मळे. शुभभावथी संयोग मळे पण स्वभाव न मळे. एनो अर्थ ए के धर्मीने आत्मा रुच्यो छे, एने शुभभावथी-व्रतादिनी रुचि नथी. ज्ञानीने ए शुभभाव, एनाथी थतुं बंधन अने एनुं फळ जे आवे ते बधुंय परज्ञेय तरीके छे. ए संयोगी भाव अने ए संयोगो मारा एम ज्ञानी मानतो नथी.
शुद्ध आत्माना अनुभवी सम्यग्द्रष्टिने तो अतीन्द्रिय आनंदना स्वादनी रुचि छे. अहाहा! चक्रवर्तीने छ खंडनुं राज्य मळे तोपण ते समक्तिी होवाथी तेने ज्ञानमां परज्ञेय तरीके जाणे छे, पोताना तरीके जाणतो नथी. समयसार नाटकमां बनारसीदास कहे छेः-