७४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
आ पांच अणुव्रत, पांच महाव्रत वगेरेना शुभभाव ए मारा छे एम ज्ञानीए मान्युं नथी, पण ए परज्ञेय तरीके छे, स्वज्ञेयमां नहि. तेथी तेना फळ तरीके जे कर्मनुं बंधन पडयुं ए पण परज्ञेय तरीके छे. मने बंधन छे, हुं बंधाणो एम ज्ञानी मानतो नथी. तथा एना फळमां जे संयोग मळे ते पण एने परज्ञेय छे. संयोग मारा छे एम ज्ञानी मानतो नथी.
सम्यग्द्रष्टि धर्मीने आत्मानो स्वाद रुचिकर छे. रुचिकर एटले आनंद आपनारो. रुचि-श्रद्धा-प्रतीतिनी व्याख्या आ छे के-एने प्रत्यक्ष (आत्माना) आनंदनो स्वाद आव्यो ते रुचि-श्रद्धा-प्रतीति छे. आ जैनधर्म छे जुओ, जैनदर्शन ए वस्तुदर्शन छे. बधाने भेगा करीने विश्वधर्म विश्वधर्म कहे पण ए विश्वधर्म छे ज नहि. भगवान सर्वज्ञदेवे कहेलो एक ज मार्ग विश्वधर्म-जैनधर्म छे. एने बीजा कोई धर्म साथे मेळ छे नहि. भाई, बीजाने ठीक लागे के न लागे, पण वस्तु तो आ छे. वस्तु ज्ञानानंद- स्वभावी जे ज्ञायक आत्मा तेनी रुचि करतां जे ज्ञान अने आनंदनी शक्ति छे ते पर्यायमां प्रगट थाय छे, तेने आस्वादो एम कहे छे. आ मार्ग छे, आ सिवाय बीजो कोई मार्ग नथी. कुंदकुंदाचार्यनी एक गाथा छे के समक्ति जेवी कल्याणकारी जगतमां कोई चीज नथी अने मिथ्यात्व जेवी अकल्याणकारी जगतमां कोई चीज नथी.
तेथी अहीं कहे छे के रसिकजनोने रुचिकर उदय थई रहेलुं जे ज्ञान ते आस्वादो, कारण के ‘इह’ आ लोकमां ‘आत्मा किल’ आत्मा छे ते खरेखर ‘कथम् अपि’ कोई प्रकारे ‘अनात्मना साकम्’ अनात्मा (परद्रव्य) साथे ‘क्वापि’ कोई काळे ‘तादात्म्यवृत्तिम् न कलयति’ तादात्म्यवृत्ति (एकपणुं) पामतो नथी. अनात्मा एटले रागथी मांडीने बधी चीजो अनात्मा छे. आ आत्मानी अपेक्षाए सिद्ध भगवान पण अनात्मा छे. अहाहा! अहीं कहे छे के कोई पण प्रकारे कोई काळे भगवान आत्मा परद्रव्य साथे एकरूप थतो नथी. भगवान ज्ञायकस्वरूप प्रभु गुण-गुणीना भेदना विकल्पथी मांडीने बधाय जे अनात्मा-परद्रव्य तेनी साथे एकपणाने पामतो नथी. आवो धर्म अने आवो मार्ग! अहाहा!
प्रश्नः–दया पाळवी, व्रत करवां ए तो तमे कहेता नथी?
उत्तरः–सांभळने बापा! ए दया अने व्रतनो जे विकल्प छे एमां तारी दया नथी. परनी दया पाळवानो विकल्प ए शुभभाव छे. (स्वरूपनी हिंसा छे.) बापु! स्वना आश्रयनो मार्ग कोई अलौकिक छे. तेथी परनो आश्रय छोडीने स्वनो आश्रय कर एम कहे छे. आत्मा राग अने पर साथे कदी पण एक्ता पामतो नथी. कारण के ‘एकः’ आत्मा एक छे. ते अन्य द्रव्य साथे एकरूप थयो नथी. जुओ एक कळशमां केटलुं भर्युं छे? अमारी आंख सारी हती, हमणां जरा बगडी छे, अमारुं शरीर अत्यार सुधी नीरोगी रह्युं छे, कोई दिवस सूंठ पण चोपडी नथी इत्यादि. आम ‘अमारुं’ अमारुं एवी पर साथे