Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा २०-२१-२२ ] [ ७प एकत्वबुद्धि करीने मरी गयो (संसारमां रखडयो). पण भाई! पहेलांय शरीर तारुं कयारे हतुं अने अत्यारे पण तारुं कयां छे? कोई काळे पण (परमां) प्रवृत्ति तुं माने एम थती नथी.

मोक्ष अधिकारमां एम लीधुं छे के राग अने भगवान आत्मा वच्चे संधि छे, तड छे, निःसंधि-एक कदीय थया नथी. आवो पाठ छे. फक्त तें एम मान्युं छे के आ राग, पुण्य, विकल्प इत्यादि मारां. ए तारी मान्यतामां निःसंधि-एकपणुं छे. बाकी खरेखर बे वच्चे संधि-तड छे. आ लोकमां आत्मा छे ए अनात्मा साथे कोई प्रकारे खरेखर एकपणुं पामतो नथी, कारण के ते एक छे. ते बगडे बे थतो नथी. एकडे एक अने बगडे बे. आत्मा एकपणे छे अने राग बीजी चीज छे. आत्मा राग साथे एकपणुं पामतो नथी, जो एकपणुं पामे तो ते आत्मा बगडी जाय, बगडे बे थई जाय. परंतु आत्मा बधाय अन्य द्रव्य-रागादि विकल्पो साथे एकरूप थतो नथी केमके ते एक एकः छे. आ धर्मनी रीत छे.

* कळशः २२ भावार्थ *

आत्मा कोई काळे अने कोई प्रकारे परद्रव्य साथे एटले राग, शरीर, मन, वाणी, कर्म, देश, जड इन्द्रियो साथे, अरे खंड खंड भावेन्द्रियो साथे एक्ताभावने पामतो नथी. आ रीते आचार्ये अनादिथी परद्रव्य प्रत्ये लागेलो मोह एटले परमां थयेली सावधानीथी आत्मानुं भेदज्ञान बताव्युं छे, अने प्रेरणा करी छे के ए एकपणाना मोहने हवे छोडो. रागादि साथेना एकपणाने हवे छोडी आत्मा एक छे एनी साथे एक्ता प्राप्त करो, ज्ञानस्वभाव साथे एकपणुं प्रगट करो, निज ज्ञानस्वरूप आत्माना आनंदने आस्वादो-ज्ञानने आस्वादो. अहो! अमृतचंद्राचार्यना कळशो घणा गंभीर छे. एमनी टीका पण घणी गंभीर छे. शास्त्रोमां कांई भाव भर्या छे एमणे! जेम आंचळमांथी दूध संभाळपूर्वक दोहीने काढे तेम शास्त्रोमां भरेला भावो तर्कनी भींस दईने काढया छे, टीकामां भर्या छे.

भगवान आत्मा ज्ञानस्वरूप (चैतन्यस्वरूप) छे. रागभाव ए अचेतनस्वरूप छे. चाहे तो दया, दान, के व्रतनो विकल्प हो के गुण-गुणीना भेदनो विकल्प हो, ए (सघळा) विकल्प अचेतन छे. तेमां ज्ञानस्वभावनुं किरण नथी. रागमां ज्ञानस्वभावनुं किरण नथी. माटे ते रागनुं आस्वादवुं छोडी आ ज्ञानस्वरूप आत्माने आस्वादो. भगवान आत्मामां आनंद, सुखनो आस्वाद छे. अनादिकाळथी रागनो आस्वाद कर्यो ते दुःखनो-आकुळतानो स्वाद हतो, एमां कांई नवीन नथी. तेथी नवुं करवुं होय तो ज्ञानने आस्वादो एम कहे छे.

‘मोह छे ते वृथा छे.’ भाषा जुओ. मोह छे ते वृथा अने अमोह ते सफळ. मोह कहेतां परमां सावधानी ते वृथा-अफळ (मोक्ष माटे छे.) अने अमोह कहेतां