Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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८६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ भासतुं नथी. ए रागने एकपणे पोतापणे अनुभवतो नथी. ए (रागादि) अनात्मामां आत्मा मानतो नथी.

जेम हस्ती आदि पशुओ सुंदर आहारने तृणसहित खाय छे एम भगवान ज्ञायकस्वरूप आत्माने तुं रागसहित अनुभव करे छे तो तुं ढोर जेवो छे एम कहे छे. सर्वथा एकान्तवादीओना १४ भंगो-एकान्त नित्य-अनित्यादिना १४ श्लोको (र४८ थी र६१) समयसारमां आवे छे. त्यां ए एकान्तवादीओने विवेकहीन पशु कहीने संबोध्या छे. अहा! जेने निजस्वभावनुं भान नथी अने एकान्तद्रष्टिथी माने के आ राग ते हुं छुं तो ते पशु ज छे. एनुं फळ पण अंते पशु एटले निगोद ज छे. माटे आचार्य करुणा करीने कहे छे के पशु जेम सुंदर आहारमां घासने भेळवीने खाय तेम आ सुंदर ज्ञायकस्वभावी आत्मा साथे रागने भेळवीने खावाना स्वभावने तुं छोड, छोड. रागथी भिन्न एक सुंदर ज्ञायकभावनो अनुभव कर. ए अनुभव आनंदरूप छे, सुखरूप छे.

हवे कहे छे के-‘जेणे समस्त संदेह, विपर्यय, अनध्यवसाय दूर करी दीधां छे अने जे विश्वने (समस्त वस्तुओने) प्रकाशवाने एक अद्वितीय ज्योति छे एवा सर्वज्ञ- ज्ञानथी स्फूट (प्रगट) करवामां आवेल जे नित्य-उपयोगस्वभावरूप जीवद्रव्य ते केवी रीते पुद्गलद्रव्यरूप थई गयुं के जेथी तुं आ पुद्गलद्रव्य मारुं छे एम अनुभवे छे?’

जुओ, सर्वज्ञ परमेश्वर त्रिलोकनाथ अरिहंतदेवने समस्त संदेहरहित निःसंदेह, कोईपण प्रकारनी विपरीतता रहित अविपरीत अने कोईपण प्रकारना अनध्यवसाय एटले अचोक्कसता रहित चोक्कस ज्ञान थयुं छे. अहाहा! चैतन्यसूर्य सर्वज्ञदेव भगवानने एक समयमां लोकालोकने जाणनारी केवळज्ञानरूप अद्वितीय ज्योति प्रगट थई छे. भगवान तीर्थंकरदेवे केवळज्ञानमां आ जीव केवो छे ते जोयो छे अने दिव्यध्वनिमां कह्यो छे. अहीं कहे छे के भगवान सर्वज्ञदेवना ज्ञानमां तो एम आव्युं के आ जीवद्रव्य नित्य-उपयोग-स्वभावरूप छे. अहाहा! नित्य ज्ञायक, ज्ञायक, ज्ञायक एम उपयोगस्वभावरूप जीव छे. आ त्रिकाळीनी वात छे हों. जेने सर्वज्ञपणुं उपयोगरूपे प्रगट थयुं ए अरिहंत परमात्माए आत्माने नित्य-उपयोगस्वरूप ज जोयो छे.

भगवान सर्वज्ञदेवे जोयुं छे के आ आत्मा वस्तु छे. ते नित्य- उपयोगस्वभावमय एटले जाणवा-देखवाना स्वभावरूप चेतन छे. एवा आत्माने वर्तमानपर्यायमां नजरमां न लेतां तारी नजर राग उपर गई अने मानवा लाग्यो के राग ते हुं, राग ते मारी वस्तु. परंतु राग तो जड अचेतनरूप पुद्गलमय छे. तो ते राग मारो एटले पुद्गलद्रव्य मारुं-एम पुद्गलद्रव्य तारुं केवी रीते थई गयुं? भगवान केवळीए तो तारा आत्माने जाणवा-देखवाना स्वभावरूपे ज जोयो छे, अने तुं कहे छे के राग ते हुं; तो जे चैतन्य उपयोगथी विरुद्धभाव-अचेतन रागस्वरूप ते तुं केम थई शके? (न थई शके)