Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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९६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ जोवा नीकळे के राणीसाहेबा केवां हशे? पछी होय भले मडदा जेवां पण ओझलमां रहे एटले जोवानुं कौतुहल थाय. अहीं एम नथी. अहीं तो चैतन्यहीरलो अंदर पडयो छे. तेथी कहे छे के भगवान ज्ञाननी मूर्ति अंदर पूर्ण चैतन्यप्रकाश पडयो छे एने राग अने शरीरथी भिन्न पाडीने जो. जरा कौतुहल तो कर के आ जोनार कोण छे? जे शरीरने जाणे, रागने जाणे, आ जाणे, ते जाणे ए जाणनारमां शुं छे? कहे छे के जाणनार जे शरीर अने रागादिने जाणे ते शरीर अने रागादि एमां नथी. जेम शरीर अने राग ज्ञानमां नथी तेम ज्ञान शरीर अने रागमां नथी.

हे भाई! आ चैतन्यतत्त्व शुं छे एम जाणवानुं कुतुहल (जिज्ञासा) करी एने जो. वीस वर्ष पहेलांनी आ वात छे. जामनगरमां नवथी दश वर्षनो एक नानो छोकरो हतो. एणे प्रश्न कर्यो के-महाराज! चर्चामां आप आत्मा आत्मा करो छो पण आम आंख मींचीए तो त्यां अंधारुं देखाय छे. आत्मा तो देखातो नथी? उत्तरः-भाई! ए अंधारुं छे एम ए कोणे जोयुं? आ ज्ञानप्रकाशे अंधाराने जोयुं के अंधाराए अंधाराने जोयुं? ए अंधाराने जोनारुं जे ज्ञान छे ते आत्मा छे. पण कयां एनी पडी छे एने? एने तो आ पैसा पांच-पचास लाखनी धूळ मळे, कांईक आबरू मळे एटले एम जाणे के हुं मोटो शेठ. ए अभिमानमां पछी जाय मरीने हेठे. आम अजीवने मारुं माने ए मूढ छे. अहीं तो चोकखी वात छे, माखण-बाखण नथी. अहाहा! आचार्यनी टीका तो जुओ. कहे छे के भगवान! एक वार तुं कोण छे एनुं कुतुहल तो कर.

आ आत्मा ज्ञायकस्वभाव तो एवो ने एवो रह्यो छे. अनादिथी एवो छे. गमे तेटला मिथ्यात्वभाव सेव्या. अनंत वार नरक-निगोदमां गयो, कीडा, कागडा, कूतरा आदि पशुना अनंत भव कर्या, ८४ लाख योनिमां अनंत परिभ्रमण कर्युं पण ए भगवान वस्तु तो वस्तुपणे (ज्ञायकभावपणे) त्रिकाळ रही छे. तेथी कहे छे आ मूळ वस्तुने जो अने पाम. बीजुं भले आवे, व्यवहार भले हो. ज्ञानानंदस्वरूप वस्तुना भान विना तारा ए व्यवहारने व्यवहार कहेता नथी. लोकोने आ बहु खटके छे. (अने लोको एमां ज अटके छे) ए व्यवहार पण व्यवहार कयारे कहेवाय, भाई? ज्यारे एने अंतरमां आत्मानो अनुभव थाय त्यारे. पछी ज्यां सुधी ए स्वरूपमां पूर्ण स्थिर थाय नहि त्यांसुधी एने एवो भक्ति, पूजा आदिनो राग आवे. ए रागने व्यवहार कहेवाय. पण ए पुण्यबंधनुं कारण छे, धर्म नहि. एनाथी चक्रवर्ती, बळदेव आदि पदवी मळे. पण ए पुण्यबंधनुं कारण छे, धर्म नहि. एनाथी चक्रवर्ती, बळदेव आदि पदवी मळे. पण अज्ञानी एकलां दया, दान आदि करी एने धर्म माने तो ए तो मिथ्यात्वनुं सेवन छे. एनाथी तो परंपराए हेठे (नरक-निगोदे) जाय. शुं करीए, भाई? वस्तुस्थिति आवी छे.

अहाहा! कहे छे के आ शरीरादि मूर्तद्रव्योनो एक मुहूर्त पाडोशी थई आत्मानो अनुभव कर. ‘शरीरादि’ शब्द छे ने? एटले ए बधां मूर्तिकद्रव्य. दया, दान, व्रत