गाथा २३-२४-२प ] [ ९७ आदि पुण्यना परिणाम पण मूर्त छे. ए बधा मूर्तद्रव्योनो पाडोशी था (स्वामी नहि), अने ज्ञायकस्वभाव तरफ झूकाव कर. तेथी तने राग अने शरीरथी जुदो चैतन्यभगवान देखाशे. राग अने पुण्यने तुं वेदे छे ए तो अजीवनो अनुभव छे. रागमां चैतन्यज्योति नथी. जेम अग्निनी ज्योत उपर काजळ झीणी झीणी काळी छारी होय ए अग्नि नथी तेम चैतन्यज्योति भगवान आत्मामां उपर जे पुण्य-पापना विकल्प छे ए काजळ समान छे, ए आत्मा नथी. अहीं कहे छे के पुण्य-पापना विकल्पथी बे घडी भिन्न पडी निज चैतन्यस्वरूप आत्मानो अनुभव कर. भाई! जन्म-मरणना फेरा मटाडवा होय एणे करवानुं आ छे.
एकवार प्रभु! तुं राग अने शरीरनुं लक्ष छोडी अंतरमां लक्ष कर. तेथी तने राग अने शरीरनुं साचुं पाडोशीपणुं थशे. क्षणवारमां आत्मा रागथी जुदो पडी जशे, फरी एक थशे नहि. आ अनुभव ते सम्यग्दर्शन छे. हवे आ चीज विना व्रत, तप वगेरे करीने मरी जाय पण शुं थाय? बहु बहु तो शुभभाव थाय. पण ए तो राग छे. रागने तो आग कही छे. दोलतरामजीए छहढाळामां कह्युं छेः-“यह राग आग दहै सदा तातैं समामृत सेईए” रागनो विकल्पमात्र आग छे अने भगवान आत्मा शान्तिना अमृतनो सागर छे. राग कषाय छे. कषाय एटले कष+आय-जे संसारनो लाभ आपे ते. रागदशा तो संसारनो लाभ आपनारी छे. माटे एनाथी भिन्न पडी अमृतनो सागर प्रभु चैतन्य भगवाननो अनुभव कर. अहीं जेम ‘मृत्वा’ एटले मरणांत परिषहनी पण दरकार कर्या विना आत्मानुभव कर एम कह्युं छे तेम अध्यात्मतरंगिणीमां ‘च्युत्वा’ एटले मोहथी छूटीने तुं अंदर जो के ए कोण छे अने एनो अनुभव कर. भाषा सादी छे पण भाव तो आ छे, भाई.
ज्यारे सम्यग्दर्शन थशे त्यारे तने आत्मज्ञान एटले आत्मा जेवो छे तेवुं तेनुं ज्ञान थशे. तेथी निजपद प्राप्त थशे अने पछी मोक्ष थशे, बहारमां धामधूम करे, मंदिरो बंधावे पण ए बधामां सार वात आ एक ज छे के रागादिनो पाडोशी थई आत्माने केटलो अनुभव्यो? (अनुभव प्रधान छे) हवे कहे छे ‘अथ येन’ के जेथी ‘स्वं विलसन्तं’ पोताना आत्माने विलासरूप, ‘पृथक् समालोक्य’ सर्व परद्रव्योथी जुदो देखी ‘मूर्त्या साकम्’ आ शरीरादि मूर्तिक पुद्गलद्रव्य साथे ‘एकत्वमोहम्’ एकपणाना मोहने ‘झगिति त्यजसि’ तुं तुरत ज छोडशे.
पहेलां एम कह्युं के शरीरादि मूर्तद्रव्योथी भिन्न पडी कोई पण रीते आत्मानो अनुभव कर. हवे कहे छे के ए अनुभवथी तने अतीन्द्रिय आनंदना धामरूप भगवान आत्मा सर्व परद्रव्योथी भिन्न देखाशे. ज्यारे पुण्य-पापना विकल्पनो अनुभव हतो त्यारे