बंध थयुं एम अज्ञानी माने छे ते तेनी मिथ्या दशा (मिथ्या मान्यता) छे, ते परकाळथी स्वकाळ माने छे.
अहा! त्रिकाळ शक्तिरूप जे वस्तु छे तेनुं वर्तमान ते एनो स्वकाळ छे-काळलब्धि छे, ते निमित्तने लईने छे एम नथी. निमित्त नथी एम वात नथी, निमित्तने लईने आमां (-आत्मामां) कांई (विलक्षणता) थाय छे एम नथी. तो-
प्रश्नः– दुकाने बेठा होईए त्यारे अमुक प्रकारनी (धंधारूप पापनी) पर्याय थाय छे अने अहीं स्वाध्याय मंदिरमां आवीए छीए त्यारे बीजा प्रकारनी (प्रशस्त रागनी) पर्याय थाय छे ते कोने लईने?
उत्तरः– कह्युं ने के प्रत्येक पर्याय स्वकाळे पोताने लईने थाय छे. कोई वळी कहे छे- मणिरत्ननी माळा गणीए तो एने लईने विशेष सारा भाव थाय. परंतु ए (मणिरत्ननी माळा) ए तो परज्ञेय छे बापा! अने तत्संबंधी अहीं जे ज्ञान थाय छे ए पोतानुं छे; ए कांई मणको के मणकाना फरवाने लईने थयुं छे एम नथी. भगवाननी वाणी नीकळे ते काळे वाणी सांभळीने जे ज्ञान थाय छे ते पोतानी ज्ञाननी पर्यायनी तत्काळ योग्यता छे, एनो ते स्वकाळ छे, वाणीना कारणे ते ज्ञाननी पर्याय थई छे एम नथी. आ पानुं अने आ पंकित-लीटीना आलंबनकाळे आ पानुं अने आ पंक्ति लक्षमां आवे छे तेथी एने लईने मारुं ज्ञान थाय छे एम अज्ञानी माने छे, पण एम छे नहि. अज्ञानीनो आ तर्क छे के-
जो ज्ञान निमित्तथी थतुं न होय तो सांभळवा जाओ छो शुं काम? प्रभु! सांभळ. ते समये (सांभळवाकाळे) ज्ञाननी पर्याय थई छे ते एनो स्वकाळ छे, अने सांभळवाना रागनी पर्याय थई छे ते पण एनो स्वकाळ छे. बन्नेनो समकाळ अवश्य छे, पण एकने लईने बीजी अवस्था छे एम नथी. (आ तो आवो सहज निमित्त-नैमित्तिक भाव बने छे). अहा! एक स्वकाळनो यथार्थ निर्णय थाय तो शुं वात छे? (एम के बधी अज्ञानजन्य मान्यताओ उडी जाय). पण अरे! अनादिकाळथी वर्तमान अवस्था परने लईने छे एवा मिथ्यात्वभावने एणे घूंटयो छे ते छोडतो नथी! ते पोताना सत्ने असत् करे छे. हुं ज्ञानस्वरूप छुं, ने वर्तमान ज्ञाननी जे दशा थई छे ते मारुं सत् छे, ते स्वकाळ छे एम अज्ञानी मानतो नथी, केमके एनी द्रष्टि स्व उपर नहि पण पर उपर छे. सामे शब्दो-निमित्त भले हो, पण ते काळे ज्ञाननी पर्यायनो तेने जाणवानो स्वकाळ छे ते सत् छे-एम अज्ञानी वस्तुस्थिति मानतो नथी, ने ए रीते पोतानो नाश करे छे.
आत्मानां द्रव्य-गुण ने पर्याय-त्रणे सत् छे एनो अर्थ शुं? एनो अर्थ