३९४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० ए थयो के अनंती पर्यायो जे समये थाय ते समये ते ज एनो स्वकाळ छे-एनी काळलब्धि छे, ते पोताथी सत् छे. खरेखर ते पर्यायो परथी-निमित्तथी तो नथी, पोताना द्रव्य-गुणथी पण नथी एवुं ए सत् छे. सूक्ष्म वात बापा! आ मिथ्यात्व अने राग-द्वेष जे जीवनी अवस्थामां थाय छे ते एना षट्कारकथी छे, परकारकोने लईने नहि. हवे ज्यारे विकार पण पोताना स्वकाळे एक समयना पोताना षट्कारकथी छे तो निर्मळ-निर्विकार दशानुं शुं कहेवुं? एनी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी दशा पण एना षट्कारकथी प्रगट थाय छे. भाई! सम्यग्दर्शननी पर्याय प्रगट थाय तेने कोई देव-गुरु- शास्त्रनी के व्यवहाररत्नत्रयनी के दर्शनमोहना अभावनी अपेक्षा नथी. सत्नुं आवुं ज स्वरूप छे भाई!
उपादान अने निमित्त-बन्नेमां परिणमन पोतपोतानुं एक साथे थाय छे, प्रत्येकनी ते ते पर्याय ते एनो स्वकाळ छे, मतलब के एकने (निमित्तने) लईने बीजामां (उपादानमां) कांई थाय छे एम छे नहि. बन्नेमां काळप्रत्यासत्ति ने क्षेत्र प्रत्यासत्ति जोईने अज्ञानीने भ्रम थई जाय छे के आने (निमित्तने) लईने आ (उपादाननुं कार्य) थयुं छे, पण एम छे नहि. जो निमित्तने लईने कार्य थाय तो एनी द्रव्यगत तत्कालीन योग्यता अर्थात् उपादान सिद्ध ज नहि थाय. भाई! माटीमांथी घडो थयो ते माटीमां तत्काळ जे योग्यता घडारूप थवानी हती ते प्रगट थई घडो थयो छे, कांई कुंभारने कारणे-कुंभारे आम-तेम हाथ फेरव्यो ते कारणे घडो थयो छे एम नथी. अहा! आत्मद्रव्यनी जेम एक एक पुद्गल-परमाणुमां पण अनंतगुण छे, अने एनी समयसमयनी पर्यायो जे थाय छे ते, ते ते पर्यायनो स्वकाळ छे. (परने लईने तेओ थाय छे एम छे नहि).
पण आ तो क्रमबद्ध सिद्ध थयुं? हा, क्रमबद्धपर्याय-क्रमनियमित पर्याय ए तो वस्तुस्थिति छे. आ तो अद्भुत अलौकिक वात छे भाई! भगवान! तुं ज्ञातास्वरूप ज छो, स्वमां के परमां जे पर्याय थाय तेने बस जाण; एमां तारे करवानुं कांई ज नथी.
साधकने जे सम्यग्ज्ञाननी दशा थई छे ते स्वकाळे थई छे, ते दशा तेनो स्वकाळ छे, परंतु ते अपूर्ण छे एटले साथे ते काळे राग-व्यवहार होय छे. आ शुद्ध परिणति ते निश्चय अने साथे जे राग ते काळे छे ते व्यवहार. आ व्यवहार अने आ निश्चय-एम बन्नेनुं साधकने ज्ञान छे, पण व्यवहारथी निश्चय थाय एम एमां नथी, अने एवी वस्तुस्थिति पण नथी. समजाय छे कांई....? आ समजवुं पडशे भाई! बाकी बहारमां- पैसा बैसामां बधुं धूळधाणी छे. ए पैसो-बैसो बधुं एनामां एना स्वकाळे छे, ए तारामां नहि अने ताराथीय नहि. आवुं झीणुं छे बधुं!