थको अज्ञानी-एकांती नाश पामे छे. अहा! आलंबनना काळे आलंबनरूप जे निमित्त छे तेनाथी ज मारी अवस्था छे एम मानीने अज्ञानी पोतानी हयातीनो निषेध करे छे. ल्यो, आनुं नाम हिंसा छे. स्वहिंसा करी ने? स्वहिंसा ए ज वास्तवमां हिंसा छे.
अहा! भगवान! तुं वस्तु पदार्थ छो के नहि? छो. तो एमां ज्ञानादि अनंत गुण छे. अहा! ते अनंत गुणनी वर्तमान दशा जे थाय छे ते पोतामां पोताथी थाय छे. ते ते दशा ते वस्तुनो स्वकाळ छे. वर्तमान ज्ञाननी दशा ते एनो स्वकाळ छे. छतां वर्तमान ज्ञाननी दशा देव-गुरु के शास्त्रने लईने थई एम तुं माने ते मूढपणुं छे. गुरुनी वाणी सांभळवाथी के शास्त्र वांचवाथी मारी ज्ञाननी दशा उघडी एम माननार मूढ जीवो, अहीं कहे छे, आत्मानी वर्तमान अवस्थानो ईन्कार करता थका पोतानो नाश करे छे, पोतानो घात करे छे. वस्तुनी पर्यायना स्वकाळने न मानतां निमित्तथी पोतानी दशा थई, ने जेवुं निमित्त आवे-मळे तेवी एनी दशा थाय एम माननार, अहीं कहे छे, मूढ छे, अज्ञानी छे, मिथ्याद्रष्टि छे. ते मिथ्याभाव वडे पोतानो घात करनारो छे. समजाणुं कांई.....?
जुओ, देव-गुरु-शास्त्र, जिनप्रतिमा, जिनमंदिर, सम्मेदशिखर ने शेत्रुंजो ए बधुंय छे खरुं, पण ए बधुं परज्ञेय छे, परकाळ छे. ए परकाळथी ज जे पोताना ज्ञाननुं अस्तित्व जाणे छे, माने छे ते मूढ छे, अज्ञानी छे; केमके एवुं वस्तुस्वरूप नथी.
प्रश्नः– तो पछी मंदिरमां जावुं केम (शा माटे?) उत्तरः– अरे भाई! पूर्ण वीतरागदशा थई नथी त्यां सुधी धर्मी-ज्ञानी पुरुषने देव-गुरु-शास्त्र प्रति विनय-भक्ति आदिनो शुभभाव सहज ज आवे छे, आव्या विना रहेतो ज नथी. पण ए रागने लईने के देव-गुरु-शास्त्रने लईने पोतानी ज्ञाननी दशा उघडी छे एम ते मानतो नथी. शुं कीधुं? शुभभाव पण तेना काळे प्रगट थयो छे, अने ते काळे ज्ञाननी दशा पण पोतानी पोताथी स्वकाळे प्रगट थई छे एम ज्ञानी यथार्थ माने छे. जिज्ञासु मुमुक्षु जीवने पण अशुभथी बची देव-गुरु-शास्त्र आदि प्रत्ये विनय- भक्तिए प्रवर्तवानो भाव सहज ज आवतो होय छे. समजाणुं कांई.....?
अहा! जेटला त्रणकाळना समयो छे एटली वस्तुनी त्रणकाळनी पर्यायो छे. ते दरेक पर्याय समय समय प्रति क्रमबद्ध थई रही छे एम न मानतां, बहारमां ज नजर होवाथी, ते परकाळथी-परनिमित्तथी थई रही छे एम अज्ञानी माने छे अने ए रीते ते पोतानी वर्तमान अवस्थानी पोताथी नास्ति माने छे. पोतानी अवस्थानी नास्ति माने छे एटले शुं? के तेने वर्तमान अधर्मदशा उत्पन्न थाय छे. अहा! आ प्रमाणे जेणे ज्ञानमांथी वर्तमान दशानुं अस्तित्व उडाडयुं तेने त्रिकाळीनुं अस्तित्व पण सिद्ध थतुं नथी, द्रष्टिमां आवतुं नथी; तेथी एने पण ते उडाडे छे. आवी वात!