२१६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
वळी कोई कहे के जैनमां तो बधुं कर्मने लईने थाय छे एम आवे छे एटले जीव कर्मने लईने अप्रतिबुद्ध छे एम कहो तो? भाई! ए बराबर नथी. कर्म तो जड अचेतन छे. ए जडने लईने तारामां शुं थाय? ‘कर्मथी थयुं’ एम आवे ए तो निमित्त बतावनारुं कथन छे, कर्मथी जीवमां कांई थाय छे एम छे ज नहि. जीव अनादि मोहरूप अज्ञान वडे ज अप्रतिबुद्ध छे. हवे एवो जीव पोते सुलटो परिणमे त्यारे एने समजावनार केवा गुरुनुं निमित्त होय छे ते कहे छे.
अनादिथी जे मोहरूप अज्ञानथी अप्रतिबुद्ध हतो ते ‘विरक्त गुरु वडे समजाववामां आवतां’-जुओ अहीं समजावनार गुरु विरक्त लीधा छे. जे सम्यग्द्रष्टि होय अने चारित्र सहित होय ते निर्ग्रंथ मुनिराज साचा गुरु छे. जे अंतरमां रागथी छूटा पडी गया छे अने बहारमां वस्त्र-पात्रथी रहित छे तेने साचा निर्ग्रंथ गुरु कहे छे. एवा विरक्त गुरु वडे ‘निरंतर समजाववामां आवतां’-निरंतर समजाववामां आवतां एटले गुरु कांई चोवीसे कलाक समजाववा नवरा होता नथी, परंतु गुरुए एने जे समजाव्युं ए वातनी सांभळनार शिष्यने एवी धून लागी गई के निरंतर ए एना चिन्तनमां रहे छे. तेथी अहीं ‘निरंतर समजाववामां आवतां’ एम कह्युं छे.
श्री गुरुए तेने कह्युं के-प्रभु! तारी चीज विकार अने कर्मथी भिन्न छे. तुं अनंत अनंत ज्ञान अने आनंदनो सागर छे. जुओ, आवी देशना देनार दिगंबर भावलिंगी संत होय छे एम अहीं कह्युं छे. अज्ञानीनी देशना धर्म पामवामां निमित्त होई शक्ती नथी. जैन दर्शनमां साधु दिगंबर होय छे अने ते वनवासी होय छे. ते रागथी विरक्त अने स्वरूपमां विशेष रक्त होय छे. आवा निर्ग्रंथ गुरुनी देशना धर्म पामवामां निमित्त थाय छे. एवा गुरु पासेथी जे देशना मळे तेने सांभळीने शिष्य निरंतर ओगाळे छे, विचारे छे. तेथी ‘निरंतर समजाववामां आवतां’ एम अहीं लीधुं छे.
श्रीगुरुए देशनामां कह्युं के-भगवान! तुं चैतन्यस्वरूप छे. तारामां अनंत गुणो भर्या छे. अहाहा! प्रभु, तुं अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत आनंद, अनंत शान्ति, अनंत स्वच्छता, अनंत प्रभुता एवा एवा पूर्ण स्वभावनी अनंत शक्तिओनुं संग्रहालय-स्थान छे; तुं विकार अने देहनुं स्थान नथी. आ सांभळनार शिष्यने एवी स्वभावनी धून चडी के तेने चोट लागी अने ते कोई प्रकारे महाभाग्यथी आत्मा समजी गयो. महाभाग्यथी एटले महापुरुषार्थ वडे तेणे स्वसंवेदन प्रगट करी लीधुं. आत्मा अतीन्द्रिय आनंद, अतीन्द्रिय शान्ति अने अनंत ईश्वरशक्तिनो समुदाय छे एवुं सम्यग्दर्शनमां तेने भान थयुं. आवुं समजीने-भान करीने शिष्य सावधान थयो, स्वरूप प्रति सावधान थयो. अनंतकाळमां जे नहोतुं कर्युं अने जे करवा योग्य हतुं ते