Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ६३-६४ ] [ १६३

टीकाः– वळी, संसार-अवस्थामां जीवने वर्णादिभावो साथे तादात्म्यसंबंध छे एवो

जेनो अभिप्राय छे, तेना मतमां संसार-अवस्था वखते ते जीव अवश्य रूपीपणाने पामे छे; अने रूपीपणुं तो कोई द्रव्यनुं, बाकीनां द्रव्योथी असाधारण एवुं लक्षण छे. माटे रूपीपणा (लक्षण) थी लक्षित (लक्ष्यरूप थतुं, ओळखातुं) जे कांई होय ते जीव छे. रूपीपणाथी लक्षित तो पुद्गलद्रव्य ज छे. ए रीते पुद्गलद्रव्य ज पोते जीव छे, पण ते सिवाय बीजो कोई जीव नथी. आम थतां, मोक्ष-अवस्थामां पण पुद्गलद्रव्य ज पोते जीव (ठरे) छे, पण ते सिवाय बीजो कोई जीव (ठरतो) नथी; कारण के सदाय पोताना स्वलक्षणथी लक्षित एवुं द्रव्य बधीये अवस्थाओमां हानि अथवा घसारो नहि पामतुं होवाथी अनादि-अनंत होय छे. आम थवाथी, तेना मतमां पण (अर्थात् संसार-अवस्थामां ज जीवनुं वर्णादि साथे तादात्म्य माननारना मतमां पण); पुद्गलोथी भिन्न एवुं कोई जीवद्रव्य नहि रहेवाथी, जीवनो जरूर अभाव थाय छे.

भावार्थः– जो एम मानवामां आवे के संसार-अवस्थामां जीवनो वर्णादिक साथे

तादात्म्यसंबंघ छे तो जीव मूर्तिक थयो; अने मूर्तिकपणुं तो पुद्गलद्रव्यनुं लक्षण छे; माटे पुद्गलद्रव्य ते ज जीवद्रव्य ठर्युं, ते सिवाय कोई चैतन्यरूप जीवद्रव्य न रह्युं. वळी मोक्ष थतां पण ते पुद्गलोनो ज मोक्ष थयो; तेथी मोक्षमां पण पुद्गलो ज जीव ठर्यों, अन्य कोई चैतन्यरूप जीव न रह्यो. आ रीते संसार तेम ज मोक्षमां पुद्गलथी भिन्न एवुं कोई चैतन्यरूप जीवद्रव्य नहि रहेवाथी जीवनो ज अभाव थयो. माटे मात्र संसार-अवस्थामां ज वर्णादिभावो जीवना छे एम मानवाथी पण जीवनो अभाव ज थाय छे.

* श्री समयसार गाथा ६३–६४ मथाळुं *

हवे, ‘मात्र संसार-अवस्थामां ज जीवने वर्णादिक साथे तादात्म्य छे’ एवा अभिप्रायमां पण दोष आवे छे एम कहे छेः-

* गाथा ६३–६४ः टीका उपरनुं प्रवचन *

जेनो अभिप्राय एटले श्रद्धान एम छे के-भले मोक्ष अवस्थामां रागादिनो जीवनी साथे तादात्म्य संबंध नथी पण संसार-अवस्थामां तो जीवने रागादि भावो साथे संबंध छे तेने कहे छे के-भाई! संसार-अवस्थामां जो जीवने वर्णादि भावो साथे संबंध होय तो संसार- अवस्थाना काळमां तारा मत प्रमाणे जीव अवश्य रूपीपणाने प्राप्त थाय. जुओ, अहीं रागादि भावने अजीव, अचेतन अने रूपी पण कह्याछे. भगवान चैतन्यस्वरूप प्रभु जीव तो अरूपी छे. अने आ रागादि भावो छे ए तो अचेतन रूपी छे. तेथी जो रागादि भावो संसार- अवस्थामां जीव साथे तादात्म्यपणे होय तो जीव अवश्य रूपीपणाने प्राप्त थाय.