Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

संसार दशामां पण आ रागादि भावो आत्माना नथी एम अहीं कहे छे. संसार अवस्थामां जीवने रंग-राग अने भेदना भावो साथे तादात्म्य संबंध नथी. छतां जो तारो एवो अभिप्राय होय के ज्ञानानंदस्वभावी जीवने संसारदशामां रंग-राग अने भेदना भावोथी तादात्म्य छे तो आत्मा जरूर रूपीपणाने प्राप्त थाय. परंतु रूपीपणुं-रूपीत्व ए तो जडनुं- पुद्गलनुं लक्षण छे. ‘कोई द्रव्यनुं’ एटले के पुद्गलनुं अने ‘बाकीना द्रव्योथी असाधारण’ एटले के जीवादि द्रव्योथी भिन्न. रूपीपणुं ए तो जीवादिथी भिन्न एवा पुद्गलनुं लक्षण छे. माटे जीवने जो संसार-अवस्थामां रंग-राग-भेदथी तादात्म्य होय तो, रूपीपणाना लक्षणथी लक्षित जे कांई छे ते बधुंय जीवपणे थई जशे. अर्थात् पुद्गल, जीवमय थई जशे; भिन्न कोई जीव रहेशे नहि.

अहा! लोको बस दया, दान, व्रत, भक्ति, आदि व्यवहारक्रिया करो एटले पोतानुं कल्याण थई जशे एम माने छे. परंतु अहीं कहे छे के-प्रभु! आ रंग, राग अने भेदना सर्व भावोने पुद्गलनी साथे संबंध छे. आत्मा जो रंगरूप थई जाय, रागरूप थई जाय के भेदरूप थई जाय तो ते रूपी थई जाय. अहाहा! अज्ञान अवस्थामां पण रंग-राग-भेद मारा छे, अने हुं तेनो र्क्ता छुं एम जे माने छे ते पुद्गलने जीवपणे माने छे. भाई! वस्तुना स्वरूपनी द्रष्टिथी जोतां रंग-राग-भेद त्रिकाळी वस्तुमां नथी, पर्यायनी अपेक्षाए तेमने जीवना कह्या छे तोपण त्रिकाळी ध्रुव स्वभावनी द्रष्टिथी जोतां तेमने जीव साथे तादात्म्य नथी तेथी तेओ जीवना नथी पण रूपी पुद्गलना छे. आ स्याद्वाद छे. आकरो मार्ग, बापु! पण मार्ग आ ज छे, भाई.

चैतन्यप्रकाशनुं पूर प्रभु आत्मा ते सदाय अरूपी छे. अने रंग-राग-भेद छे ते रूपी छे. हवे कहे छे के रूपीपणुं तो पुद्गलनुं लक्षण छे. तेथी संसार अवस्थामां पण जो कोई जीवने रंग-राग-भेद छे एम माने तो जीव रूपी-पुद्गल थई जाय. तेथी पुद्गल ज जीवपणाने पामे, भिन्न जीव रहे नहि. आ तत्त्वद्रष्टि छे. कहे छे के-प्रभु! तुं शुद्ध जीवतत्त्व - चैतन्यतत्त्व छो. माटे रंग-राग-भेदरूप अजीवतत्त्वना संबंधनी मान्यता छोड. कारण के ते संबंध तारो छे ज नहि. हवे आ वात वादविवादे केम पार पडे?

पर्यायमां रागादि छे माटे पर्याय अपेक्षाए ते सत्य छे. पण चैतन्यस्वभावनी द्रष्टिमां ए रंग-राग-भेद त्रणेय त्रिकाळी ज्ञायकभावरूप आत्मामां छे ज नहि. रंग-राग-भेदना भावो तो रूपी पुद्गल साथे संबंधवाळा छे अने तेनो जो आत्मा साथे संबंध थई जाय तो आत्मा रूपी थई जाय. तेथी जीवनो ज अभाव थई जाय. अहीं आत्माने रंग कहेतां वर्णथी, राग एटले शुभाशुभ भावोथी अने भेद एटले गुणस्थान, लब्धिस्थान आदि भेदोथी जुदो-भिन्न पाडयो छे. अहाहा! रंग-राग अने भेदथी निराळो भगवान चैतन्य महाप्रभु छे. अरे! आवुं सांभळवाय मळे नहि ते एनी रुचि अने प्रयत्न कयारे