समयसार गाथा-६३-६४ ] [ १६प करे? अत्यारे तो ‘जन-सेवा ते प्रभुसेवा,’ देशसेवा करो तेथी भगवान मळी जशे एवी प्ररूपणा चाले छे. परंतु भाई, कोना देशनी सेवा करवी? तारो देश तो रंग-राग-भेदथी भिन्न छे. तारो देश तो असंख्यप्रदेशी अभेद चिद्रूपमात्र स्वरूप छे. आवा तारा देशनी सेवा-उपासना कर तो भगवान मळी जशे.
अहाहा! रंग-राग-भेदना भावो रूपी छे एम अहीं कह्युं छे. रंग-गंध-रस-स्पर्श तो रूपी छे पण शुभाशुभभावो अने जीवस्थान-गुणस्थान-मार्गणास्थान आदि भेदो पण रूपी छे एम कह्युं छे. आत्मा निर्मळानंद प्रभु त्रिकाळ अरूपी छे तेनी अपेक्षाए आ सर्वभावो रूपी छे एम कह्युं छे. मानवुं कठण पडे पण एम ज छे, प्रभु! कर्मनी निवृत्तिथी थतां जे संयमलब्धिस्थानो छे ते पण रूपी छे एम कहे छे. ज्ञानमां जे क्षयोपशमनो अंश छे ते स्वयं निरावरण छे अने ते शुद्ध छे तथा ए ज अंश वधीने केवळज्ञान थशे एम जे कह्युं छे ए तो पर्यायनयनी अपेक्षाथी कह्युं छे. ए तो क्षयोपशमज्ञाननो अंश शुद्ध छे एम पर्यायनुं ज्ञान कराव्युं छे. ज्यारे अहीं तो स्वभावनी द्रष्टिनी वात छे. त्रिकाळी ज्ञायकभावना नूरना पूरना तेजमां ए रंग-राग-भेद छे ज नहि तेथी ते रूपी छे एम कह्युं छे. जो ए रागादि, द्रव्यना- जीवना स्वभावमां तद्रूपपणे होय तो कदी नीकळे ज नहि. अहो! वीतरागनो मार्ग अलौकिक छे!
प्रवचनसारमां एम आवे छे के ज्ञानीने-अरे गणधरने पण-रागनुं परिणमन छे अने तेना र्क्ता तेओ छे. ज्यारे अहीं रागने रूपी पुद्गलमय कहे छे! भाई! ज्ञाननो स्वभाव स्वपर-बधुंय जाणवानो होवाथी, ज्ञाननी प्रधानताथी त्यां (प्रवचनसारमां-नय अधिकारमां) पर्यायनुं ज्ञान कराव्युं छे. पण अहीं तो जीवना स्वभावनी वात छे. रंग-राग अने भेद जीवना चैतन्यस्वभावथी भिन्न, विपरीत छे. तेथी तेओ रूपी पुद्गलमय छे. अभेदनी द्रष्टिमां भेद छे ज नहि. अगियारमी गाथाना भावार्थमां कह्युं छे के-प्राणीओने भेदरूप व्यवहारनो पक्ष तो अनादिकाळथी ज छे अने तेओ भेदनी-व्यवहारनी परस्पर प्ररूपणा पण करे छे. तथा भेदनुं-व्यवहारनुं कथन, तेने हस्तावलंब जाणी, शास्त्रोमां-जैनदर्शनमां घणुं कर्युं छे. परंतु एनुं फळ संसार ज छे. गजब वात! आ वात झीरववी महा कठण छे.
अंदर पूर्णानंदनो नाथ अभेद एकरूप चैतन्यमहाप्रभु बिराजे छे. ए अभेद स्वरूपनी द्रष्टि थया विना सम्यग्दर्शन थतुं नथी. सम्यग्दर्शन, अखंड एकरूप निर्मळ चैतन्यस्वरूप भगवान आत्माना स्वीकारथी थाय छे. अभेदनीद्रष्टि भेदने रागने के निमित्तने स्वीकारती नथी, केमके अभेद वस्तुमां भेदादि छे ज नहि. माटे जे अभेदमां नथी तेनो निषेध करवो यथार्थ छे. तेथी अभेदनी द्रष्टिमां आ रंग-राग अने भेदना भावोने तेओ रूपी अने पुद्गलना लक्षणथी लक्षित छे एम कह्युं छे. ए तो श्लोकमां पण आवे छे के भेदज्ञान