१६६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ थया पहेलां अज्ञानभावे जीव रागनो र्क्ता छे तोपण ज्यारे भेदज्ञान प्रगट थाय छे त्यारे ते रागादि आत्मानी चीजमां नथी. आवी वात आकरी पडे पण तेथी ते कांई बीजी रीते पलटावी नखाय? अंदर झळहळज्योतिरूप चैतन्यभगवान छे तेने जाणवानो अभ्यास करवो जोईए.
बापु! अंदर जे आ चैतन्यना प्रकाशना नूरनुं पूर छे ए ज आत्मा छे, हों. आ जाणनार-जाणनार जे ज्ञायकमात्र वस्तु छे ए आत्मा छे. भाई! ए शरीरादिवाळो नथी, हों. आ शरीरादि छे ए तो धूळ-माटी-पुद्गल छे. अरे, आ शुभाशुभ राग अने गुणस्थान आदि भेद पण रूपी पुद्गलमय छे एम कहे छे. अहाहा! त्रणलोकना नाथ सर्वज्ञदेवे कहेली आ वात अहीं संतो प्रसिद्ध करे छे. कहे छे के-आत्मा प्रसिद्ध कयारे थाय? के ज्यारे ए रूपी, अचेतन एवा रंग-राग-भेदना भावोथी भिन्न पडीने अभेदनी द्रष्टि करे त्यारे आत्मा प्रसिद्ध थाय. नहींतर तो रंग-राग-भेदनी एटले रूपी पुद्गलनी प्रसिद्धि छे, केमके तेओ रूपी छे. टीकामां कहे छे के-रूपीत्वथी लक्षित तो पुद्गलद्रव्य छे माटे रंग-राग-भेदना भावो पुद्गलद्रव्य ज छे.
प्रश्नः– शुं आ एकांत नथी?
उत्तरः– हा, एकांत छे, पण सम्यक् एकांत छे. आवुं सम्यक् एकांत होय त्यारे पर्यायमां राग अने अल्पज्ञता छे एनुं पण यथार्थ ज्ञान होय छे. अने एनुं नाम अनेकान्त छे. भाई! वीतरागनो मार्ग झीणो लागे तोपण वस्तु तो एम ज छे.
शुद्ध चैतन्यप्रकाशस्वरूप वस्तुमां राग अने भेदने कयां अवकाश छे? रूपी वर्णनी तो शुं वात करवी, राग अने भेदना भावो पण परमां-पुद्गलमां जाय छे. आ रंग-राग-भेदना भावो पुद्गलना छे, मारा चैतन्यस्वभावमां नथी एम ज्यां निज ज्ञायकभावनी द्रष्टि थई त्यां भवनो अंत आवी गयो, जन्म-मरणना चोरासीना फेरा मटी गया. वर्णादिने ज्यां सुधी पोताना मानतो हतो त्यां सुधी मिथ्यात्व हतुं अने त्यां सुधी अनंत अनंत भवमां रखडवानी एनामां शक्ति हती. पण ज्यां अचेतन पुद्गलमय एवा रंग-राग अने भेदना भावोथी भिन्न शुद्ध चैतन्यस्वरूप अभेद एक आत्मानी द्रष्टि थाय त्यां संसारनो अभाव थई जाय छे. आवी अमूल्य चीज सम्यग्दर्शन छे. अहाहा! अंदर वस्तुना स्वरूपमां रंग-राग-भेदनो त्याग अने शुद्ध चैतन्यनुं ग्रहण छे एनी जेने खबर नथी अने बहारथी त्याग करीने, क्रियाकांड करीने कोई पोताने त्यागी माने पण ए बधुं सरवाळे शून्य छे, एनी कांई किंमत नथी.
प्रश्नः– ए पुरुषार्थ तो करे छे?
उत्तरः– भाई, अंतर अभेदस्वरूपमां रहेवुं ए ज पुरुषार्थ छे. अभेद वस्तु जे द्रष्टिमां आवी छे तेमां ज विशेष लीन थवुं ए चारित्र छे. पण सम्यग्दर्शन अने एनो