Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६३-६४ ] [ १६७ विषय शुं छे एनी खबर विना चारित्र आवे कयांथी? प्रभु! अंदर ज्ञानप्रकाशनुं पूर झळहळ चैतन्यज्योतिस्वरूप ध्रुव अभेद आत्मा छे तेनी द्रष्टि करवाथी रंग-राग-भेद जुदा थई जाय छे, एनी पर्यायमां ते आवता नथी. सम्यग्दर्शननी पर्यायमां अभेद आत्मा आवे छे, जणाय छे पण रंग-राग-भेद आवता नथी. प्रभु! आ पुरुषार्थ अने आ त्याग छे.

बहारनां त्याग-ग्रहण तो आत्माना स्वरूपमां छे ज नहीं. तथा विकारनो त्याग पण स्वरूपमां नथी, केमके स्वरूपमां कयां विकार छे? द्रष्टि ज्यां स्वरूपमां स्थिर थाय छे त्यां विकार उत्पन्न ज थतो नथी तेथी विकारनो-रागनो त्याग कर्यो एम नाममात्र कहेवाय छे. आ वात गाथा ३४मां आवी गई छे. ज्ञायकस्वभावमां विकार छे ज नहीं तो विकारने त्यागवानुं कयां रह्युं? वर्तमान पर्यायमां विकार छे. पण ज्यां ज्ञायकभाव उपर द्रष्टिनी स्थिरता थई त्यां निर्मळ परिणमन थयुं अने राग उत्पन्न ज थयो नहीं तेथी रागनो त्याग कर्यो एम कथनमात्र कहेवामां आवे छे. अहो! समयसारनुं एक एक पद अने एक एक पंक्ति अलौकिक छे!!

अहीं कहे छे के-जेम रंग-राग अने भेदना भावोने पुद्गल साथे तादात्म्य छे एम जीवनी साथे पण तादात्म्य छे एम जो मानो तो पुद्गलद्रव्य ज जीव थई जाय, चैतन्यलक्षण जीव भिन्न रहे ज नहि. भाई! आ समयसारनां पेट बहु ऊंडां छे. तेमां पण आ असाधारण गाथा छे. भगवान आत्मा एकलो चैतन्यरसनो पिंड प्रभु अभेद एकरूप वस्तु छे. तेमां रूपी अचेतन एवा रंग-राग अने भेदने तादात्म्यपणे स्थापवामां आवे तो ते रूपी पुद्गल ज आत्मा थई जाय अने चैतन्यमय भिन्न जीव रहे ज नहि. भाई! धीरजथी समजवानी वस्तु छे.

आत्मपदार्थ चैतन्यमहाप्रभु सर्वोत्कृष्ट छे. त्रणलोकमां सारभूत सर्वोत्कृष्ट वस्तु ज तुं छे. आवा आत्मपदार्थमां अचेतन, रूपी पुद्गलमय एवा रंग-राग-भेदने एकत्वपणे स्थापवामां आवे तो आत्मा ज रूपी अचेतन थई जाय. अर्थात् ए पुद्गल ज जीवपणे स्थापित थाय, अने तो पछी मोक्ष अवस्थामां पण जीव पुद्गलपणे ज रहे. पुद्गलनी साथे जे अभिन्न छे एवां रंग-रागादिने ज जो जीव मानवमां आवे तो मोक्ष थतां पण ए पुद्गल ज त्यां रहे, पण एनाथी भिन्न जीव कोई रहे नहीं. जेनाथी जेनुं तादात्म्य छे तेनाथी ते कदीय भिन्न पडे नहीं. तेथी संसार-अवस्थामां जीवने जो रागादि साथे तादात्म्य कोई माने तो, जेम संसार-अवस्थामां रागादि साथे तादात्म्य होवाथी जीव पुद्गलमय थयो तेम मोक्ष अवस्थामां पण जीव पुद्गलमय ज रहेशे. संसार-अवस्थामां पण रूपीत्व के जे पुद्गलनुं लक्षण छे ते जो जीवमां तादात्म्यपणे आवी जाय तो मोक्ष थतां पण ए लक्षण रहे ज. तेथी मोक्षमां पुद्गल ज रहेशे पण भिन्न जीव नहीं रहे.

भाई! रंग-राग अने भेदथी तो पुद्गलने ज तन्मयपणुं छे. तेथी जो संसार-