१६८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ अवस्थामां आत्माने एनाथी तन्मय माने तो आत्मा रूपी पुद्गल ज थई जाय. तो पछी संसार-अवस्था पलटीने मोक्ष थाय त्यारे कोनो मोक्ष थाय? पुद्गलनो ज मोक्ष थाय, अर्थात् मोक्षमां पुद्गल ज रहेशे, जीव नहि. एक अवस्थामां जो रंग-राग-भेद जीवथी तन्मय होय तो बीजी अवस्थामां पण ते जीवथी तन्मय एटले एकमेक ज रहेशे. तेथी संसार-अवस्थामां पुद्गलथी तन्मय जीव, मोक्ष अवस्थामां पण पुद्गलथी ज तन्मय रहेशे. अर्थात् पुद्गलनो ज मोक्ष थशे. अहो! दिगंबर संतोए गजब काम कर्यां छे. ए केवळीना केडायतीओए तो केवळज्ञानना ‘कक्का’ घूटांव्या छे. ‘क’ एटले केवळज्ञानी आत्मा. कहे छे के आ आत्मा जो रंग-रागथी अभेद थई जाय तो आत्मा ज रहेतो नथी, अर्थात् पुद्गलथी जुदो कोई जीव ज सिद्ध थतो नथी.
अहा! आवी वात बीजे कयांय छे ज नहि. सर्वज्ञ परमात्माए जे दिव्यध्वनिमां कह्युं हतुं ते संतोए कह्युं छे. लोको तो बस बहारथी त्याग करो, पंचमहाव्रत पाळो अने भगवाननी भक्ति आदि करो एटले धर्म थई गयो एम माने छे. तेओ शुभभाव वडे ज निर्जरा थाय एम माने छे. परंतु भाई, शुभभावने तो अहीं रूपी अचेतन पुद्गलना परिणाममय कह्यो छे. तो पछी एनाथी निर्जरा केम थाय? आचार्य कहे छे के-आ टीका करवानो जे शुभ विकल्प आव्यो छे ते मारो नथी, केमके ते पुद्गलनी साथे तादात्म्य संबंध राखे छे, मारी साथे नहि. अहाहा! टीकाना शब्दोनी जे क्रिया छे ते तो मारी नथी पण एनो जे विकल्प आव्यो छे ते पण पुद्गलनी साथे संबंध राखे छे तेथी मारो नथी एम कहे छे. हुं तो मात्र तेनाथी भिन्न रहीने तेने जाणवावाळो छुं. अहाहा! मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय आदि पर्यायमां जे भेद पडे छे तेनो हुं मात्र जाणवावाळो छुं. ए भेदो मारी चीज नथी. निमित्तने, रागने अने भेदने हुं जाणवावाळो छुं पण जेने हुं जाणुं छुं ए निमित्तरूप, रागरूप के भेदरूप हुं नथी. अहो! भेदज्ञाननी शुं अद्भुत अलौकिक कळा आचार्योए बतावी छे! ए भेदविज्ञानना बळे रंग- राग-भेदथी भिन्न पडीने पोताना शुद्ध ज्ञायकस्वभावने द्रष्टिमां लई तेमां ज एकाग्र थतां संवर-निर्जरा थाय छे अने ए ज शुद्ध रत्नत्रयरूप धर्म छे. बाकी रंग-राग-भेद सहित आत्मानी द्रष्टि करवी ए मिथ्यादर्शन छे.
अहीं कहे छे के-रंग-राग-भेदना भावो संसारदशामां आत्माना छे एम जो तुं माने तो एनाथी भिन्न अन्य कोई जीव रहेशे नहि, अने तो मोक्ष अवस्थामां पण पुद्गल द्रव्य ज जीव ठरशे, कारण के सदाय पोताना लक्षणथी लक्षित एवुं द्रव्य बधीय अवस्थाओमां हानि अथवा घसारो नहि पामतुं होवाथी अनादि-अनंत होय छे. भगवान आत्मा ज्ञायकमात्र शुद्ध चैतन्यरसकंद छे. तेनी साथे रंग-राग-भेदना भावोने तादात्म्य छे एम जो तुं माने तो आत्मद्रव्य रंग-राग-भेदना लक्षणथी लक्षित थाय. अने ते लक्षण कोईपण वखते हानि के घसारो पामे नहि. तेथी करीने आत्मा एनाथी भिन्न