Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६३-६४ ] [ १६९ कयारेय रहे नहि. एटले के आत्मा आत्मापणे रहे नहि अर्थात् जीवनो जरूर अभाव थाय. अहो! टीकामां अमृतचंद्रस्वामीए एकलां अमृत रेडयां छे. कहे छे के रंग-राग-भेदने जो तुं आत्मानुं लक्षण माने तो, लक्षण कयारेय हानि के घसारो नहि पामतुं होवाथी, ते (रंग-राग- भेद) त्रणेय काळ आत्मामां रहे अने तो पछी आत्मा आत्मापणेशुद्ध चैतन्यपणे रहे नहि, तेनो अभाव ज थाय.

* गाथा ६३–६४ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

आ जीव-अजीव अधिकार छे. जीव कोने कहेवाय एनी अहीं वात छे. जीव तो अनंत अनंत गुणनो अभेद शुद्ध चैतन्यमात्र पिंड छे. रंग-राग अने भेदना सघळाय भावो एमां नथी. रंगमां वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय, कर्म वगेरे आवी जाय. रागमां शुभाशुभभाव अने अध्यवसान आवी जाय, तथा भेदमां जीवस्थान, मार्गणास्थान, गुणस्थान, लब्धिस्थान इत्यादि भेदो आवी जाय. हवे जीव एने कहीए के जे आ बधाय रंग-राग-भेदना भावोथी निराळो-भिन्न त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यपणे छे. तथापि जो एम मानवामां आवे के संसार-अवस्थामां जीवने रंग-राग-भेदनी साथे तादत्म्य संबंध छे तो जीव मूर्तिक थई जाय केमके रंग-राग-भेदना भावो बधाय मूर्तिक छे. तथा मूर्तिकपणुं तो पुद्गलनुं ज लक्षण छे. तेथी जीव अने पुद्गल एक थई जाय. बहु सूक्ष्म वात, भाई! आ दया, दान, व्रत, व्यवहाररत्नत्रय आदिनो राग अने गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि भेदो मूर्तिक-रूपी छे. एनाथी जीव जो अभिन्न होय तो जीव मूर्तिक पुद्गलमय थई जाय, भेदादिथी भिन्न कोई चैतन्यरूप जीव रहे नहि. अने तो पुद्गलद्रव्य ए ज जीव एम ठरे.

जुओ, आ शास्त्रज्ञान छे ए परज्ञेय छे, स्वज्ञेय नथी. एने अहीं मूर्तिक कहीने पुद्गलमय कह्युं छे. ज्यारे भगवान आत्मा तो अखंड, अभेद, एक शुद्ध चिद्रूप वस्तु छे. एमां गुणभेद के पर्यायभेद पण नथी तो पछी रंग-रागनी तो वात ज शी करवी? आवा शुद्ध चिन्मात्र अमूर्तिक जीवने रंग-राग-भेदथी अभिन्न मानतां ते मूर्तिक पुद्गलमय थई जाय छे केमके रंग-राग-भेदनुं स्वरूप मूर्तपणुं छे, अने मूर्तपणुं पुद्गलनुं ज लक्षण छे. भारे सूक्ष्म वात! एक बाजु प्रवचनसारमां एम कहे के राग-द्वेष आदि जे पर्याय छे ते पोतानी छे, निश्चयथी जीवनी छे, जीवमां छे अने अहीं तेने मूर्तिक पुद्गलमय कहे! त्यां प्रवचनसारमां पर्यायने सिद्ध करी छे. ज्ञेय एवा आत्मानी पर्यायमां राग-द्वेषादि छे एम त्यां पर्याय सिद्ध करी छे. ज्यारे अहीं त्रिकाळी शुद्ध स्वभाव सिद्ध करवो छे. द्रष्टिनो विषय जे अभेद एकरूप चैतन्यमय द्रव्य छे एने अहीं सिद्ध करवो छे. भाई! ज्यां जे अपेक्षा छे ते यथार्थ समजवी जोईए.