१७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३
मूर्तिकपणुं तो पुद्गलनुं ज लक्षण छे. माटे ए लक्षण जो जीवमां आवी जाय तो जीव चैतन्यमय द्रव्य रहे नहि, पण मूर्त पुद्गलमय ज थई जाय. अने तो मोक्ष थतां पण ते पुद्गलनो ज मोक्ष थाय. रंग-राग-भेदना भाव जो आत्माना होय तो, तेओ मूर्तिक होवाथी, मोक्षमां पण तेओ रहेशे अने तेथी एनाथी भिन्न अन्य कोई चैतन्यमय जीव नहि रहे. आ प्रकारे संसार अने मोक्षमां पुद्गलथी भिन्न अन्य कोई चैतन्यस्वरूप जीवद्रव्य रहेशे नहि. अर्थात् तेथी जीवनो ज अभाव थई जशे. अहाहा! केवी वात करी छे!
अत्यारे केटलाक लोको एम कहे छे के व्यवहारनयनो विषय जे शुभराग छे तेनुं आचरण करवाथी आत्माने लाभ थाय. परंतु भाई, एम नथी, बहु फेर छे. तेओ कहे छे के- गौतमस्वामीए पण व्यवहारथी कह्युं छे ने? (अर्थात् भेद पाडीने समजाव्युं छे ने?) भाई, ए तो भेदथी समजाव्युं छे. तेथी करीने ए व्यवहारना आश्रयथी लाभ थाय अने धर्म थाय एम कयां कह्युं छे? व्यवहारथी तो मात्र समजाव्युं छे. बीजी कई रीते समजावे? केमके भेद पाडीने समजाव्या विना शिष्यने समजमां आवतुं नथी तेथी भेद बताव्यो छे. पण भेद त्रिकाळी आत्मानी चीज छे अने तेनो आश्रय करवा योग्य छे एम नथी. आत्माना अभेद स्वभावमां भेद छे ज नहि. तेथी तो अहीं भेदने पुद्गलमां नाखी दीधो छे. आ रंग-राग-भेदना भावो मूर्तिक पुद्गलमय छे. गजब वात! संसार-अवस्थामां पण आ भेदादि भावो जो जीवना मानवामां आवे तो संसार के मोक्षमां पुद्गलथी भिन्न एवुं कोई शुद्ध चैतन्यमय जीवद्रव्य न रहे. अने तेथी जीवनो ज अभाव थाय. (शुभरागना आचरणथी आत्माने लाभ-धर्म थाय एम जेओ माने छे तेओ पोतानो-जीवनो ज अभाव करे छे).
भगवान आत्मा पूर्णानंदस्वरूप त्रिकाळ महाप्रभु छे. एना चैतन्यस्वभावने पकडवा जतां उपयोग बहु सूक्ष्म थाय छे. शुभ उपयोगथी तो नहि, पण जे मति-श्रुतज्ञाननो उपयोग बहिर्मुख छे, परने जाणवामां प्रवर्ते छे एनाथी पण आत्मा जाणवामां आवतो नथी. अहीं तो जे उपयोग पोताने पकडे ते सूक्ष्म छे. रंग-राग-भेदथी भिन्न जे पोतानी शुद्ध चैतन्यमय चीज छे तेने जे पकडे ते सूक्ष्म उपयोग छे. आवा सूक्ष्म उपयोगथी ज्यारे ते अंदरमां जाय छे त्यारे तेने सम्यग्दर्शन थाय छे. भाई! सम्यग्दर्शननो विषय त्रिकाळी एकरूप शुद्ध चिद्रूप आत्मा छे. उपयोगने एमां ज एकाग्र करतां सम्यग्दर्शन थाय छे. आवी वात छे.
देहनी क्रिया, इन्द्रियोनी क्रिया अने वाणीनी क्रिया जड छे. ए जड क्रिया आत्मा करे छे एम मानतां आत्मा जड थई जाय छे. वळी आ दया, दान, व्रत, भक्ति, पूजा, इत्यादिनो जे राग छे ते पण जड-अजीव छे, मूर्त छे. तेथी ए राग जो आत्मानो