Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६३-६४ ] [ १७१ थई जाय तो आत्मा जड पुद्गल बनी जाय. तेवी ज रीते दर्शननी पर्यायमां, ज्ञाननी पर्यायमां अने चारित्रनी पर्यायमां जे भेद पडे छे ते भेद जीवद्रव्यनुं स्वरूप नथी. जो ते जीवनुं स्वरूप होय तो त्रिकाळी जीवमां ते कायम रहे. परंतु सिद्धमां ए भेदो नथी. तथापि संसार-अवस्थामां ए भेदादि जीवना छे एम जो कहो तो संसार-अवस्थामां जीव पुद्गलमय थई जाय, केमके भेदादि छे ए तो मूर्तिक पुद्गलमय ज छे. तो पछी मोक्ष थतां, मोक्ष अवस्थामां पण पुद्गल ज रहेशे. भाषा तो सादी छे, पण एनो मर्म घणो ऊंडो छे, भाई! आ समजवा माटे खूब धीरा थवुं पडशे.

आत्मानुं यथार्थ ज्ञान-श्रद्धान करतां सम्यग्दर्शन थाय छे. परंतु ते आत्मा केवो छे? तो कहे छे के रंग-राग अने भेदथी रहित जे अभेद शुद्ध चैतन्यतत्त्व छे ते आत्मा छे. तथा जे रंग-राग अने भेद सहित छे ए तो मूर्तिक पुद्गल छे. आ शास्त्रनुं जे ज्ञान छे ते मूर्तिक पुद्गलरूप छे. जो ते स्वनुं ज्ञान होय तो साथे अतीन्द्रिय आनंद आववो जोईए. परंतु शास्त्रज्ञान साथे आनंदनो स्वाद तो आवतो नथी. माटे शास्त्रज्ञान पुद्गलमय छे. तेवी रीते देव-गुरु-शास्त्रनी भेदरूप श्रद्धा, नवतत्त्वनी भेदरूप श्रद्धा अने पंचमहाव्रतना पालननो भाव इत्यादि सर्व पुद्गलरूप छे. अने आ भाव जो आत्माना थई जाय तो आत्मा जड-पुद्गलमय थई जाय एम कहे छे.

निश्चयस्तुतिनुं स्वरूप कहेतां ३१मी गाथामां आवे छे के-जड इन्द्रियो, भावेन्द्रियो अने तेना विषयो-भगवान, भगवाननी वाणी, इत्यादि-ए बधुंय इन्द्रिय छे. वाणीना निमित्ते जे ज्ञान पोतानी पर्यायमां थाय ते पण इन्द्रिय छे. ए परलक्षी ज्ञानने अहीं पुद्गलमय कह्युं छे. तेथी जेम दया, दान, आदि भावने ते जीवना छे एम मानतां जीवनो अभाव थाय छे तेम आ शास्त्रनुं ज्ञान आत्मानुं ज्ञान छे एम मानवाथी पण जीवनो अभाव थाय छे अर्थात् जीव पुद्गलमय ज थई जाय छे.

तेवी ज रीते मार्गणामां पण लेवुं. ज्ञानमार्गणा, दर्शनमार्गणा, संयममार्गणा एवी मार्गणानी पर्यायने शोधवाथी पर्यायमां तेओ छे, तोपण जीवना चैतन्यस्वभावमां ए भेदो नथी तेथी ते पुद्गलना परिणाममय छे. ज्ञानना भेदो अने सम्यग्दर्शनना क्षायिक सम्यग्दर्शन, उपशम सम्यग्दर्शन आदि जे भेदो छे ते भेदोनुं लक्ष करतां तो राग ज उत्पन्न थाय छे. तथा आ भेदो वस्तुना चैतन्यस्वरूपमां तो छे नहि. तेथी तेमने पुद्गलना परिणाममय ज कह्या छे. तेथी आ रंग-राग-भेदना भावो जीवना स्वरूपमय छे एम मानतां पुद्गल ज जीवस्वरूप ठरशे अने तेथी, भिन्न चैतन्यमय जीव नहि रहेवाथी, जीवनो ज अभाव थशे. तेथी रंग-राग- भेद आदि जीव नथी एम नक्की करवुं. सादी भाषामां पण गूढ रहस्यमय वात संतोए करी छे ते धीरजथी समजवी जोईए.

[प्रवचन नं. १३६ शेष-१३७ (१९मी वारनां) * दिनांक १प-११-७८ थी १६-११-७८]