Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २२७

आ शास्त्रज्ञान छे ने ए परज्ञेय छे. जे शास्त्रज्ञानमां ज निमग्न छे ते परज्ञेय-निमग्न छे अने परज्ञेय-निमग्न छे ते स्वज्ञेयनो (चैतन्यस्वभावमय शुद्ध आत्मानो) अनादर करे छे. गजब वात! एने तो एम थाय के हुं आवो पंडित, आटलां तो हुं शास्त्र जाणुं अने ए कांई नहि! हा भाई, सांभळ. शास्त्रज्ञानने तो बंध अधिकारमां शब्दज्ञान कह्युं छे. शब्दज्ञान ए कांई आत्मज्ञान छे? शब्दज्ञान कहो के परज्ञेय कहो-एक ज चीज छे. ज्ञानी शास्त्रज्ञानने पण परज्ञेयपणे जाणे छे.

आम वर्णादि अने रागादि भावो जीव नथी. परंतु उपर कह्यो छे तेवो चैतन्यभाव ज जीव छे. ज्ञाननी पर्यायमां एने ज्ञेय बनावतां जीव आवो चैतन्यस्वभावमय प्रत्यक्ष-प्रगट छे एम जणाय छे ए संक्षेपमां एनो भावार्थ छे.

हवे, चेतनपणुं ज जीवनुं योग्य लक्षण छे एम कळशरूप काव्य द्वारा समजावे छेः-

* कळश ४२ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

कहे छे के-‘यतः अजीवः अस्ति द्वेधा’ अजीव बे प्रकारे छे-‘वर्णाद्यैः सहितः’ वणादिसहित ‘तथा विरहितः’ अने वर्णादिरहित. वर्ण, रस, गंध, स्पर्श, रागादि वर्णादिसहित छे अने बीजां अमूर्त द्रव्यो वर्णादिरहित छे. ‘ततः’ माटे ‘अमूर्तत्वम् उपास्य’ अमूर्तपणानो आश्रय करीने पण अर्थात् अमूर्तपणाने जीवनुं लक्षण मानीने पण ‘जीवस्य तत्त्वं’ जीवना यथार्थ स्वरूपने ‘जगत् न पश्यति’ जगत देखी शक्तुं नथी.

अहा! आ चैतन्यस्वभावमय जीव तो ज्ञानलक्षणथी लक्षित छे. अर्थात् ज्ञान वडे जणाय एवी ए चीज छे. ते रागथी के अमूर्तपणाथी जणाय एवो नथी. कारण के अमूर्त तो अन्य द्रव्यो पण छे तेथी अमूर्तपणावडे पण आत्मा जणातो नथी. ए तो ज्ञानना परिणमन वडे ज जणाय एवो छे. जे ज्ञान वडे निज आत्माने जाणे छे तेने धर्म थाय छे.

हिंसा, जूठ आदि अशुभ भावथी तो आत्मा जणाय नहि, पण दया, दान, व्रत, भक्ति आदि विकल्पोना शुभभावथी पण आत्मा जणातो नथी. शुभाशुभभाव तो चैतन्यना विकारो छे. तेओ अचेतन छे केमके शुद्ध चैतन्यमां तेओ व्यापता नथी. तेथी अचेतन एवा ते विकारो वडे चैतन्यवस्तु आत्मा केम जणाय? रागादि भाव ए कांई चैतन्यना लक्षणरूप नथी के ते वडे आत्मा जणाय, तथा अमूर्तपणुं बीजा द्रव्योमां पण छे. तेथी अमूर्तपणा वडे पण जीवने अन्य द्रव्योथी भिन्न जाणी शकातो नथी, आत्माने अन्य द्रव्यथी भिन्न जाणवो होय तो एक चैतन्यलक्षण वडे ज जाणी शकाय छे. परद्रव्यथी भिन्न निजस्वरूपनो अनुभव चैतन्यलक्षणथी ज थाय छे.

जगतना जीवो रागादिथी आत्माने जाणी शक्ता नथी, तेम ज अमूर्तपणाथी पण आत्माने जुदो पाडी शक्ता नथी-ओळखी शक्ता नथी. ‘इति आलोच्य’ आम परीक्षा