Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ करीने ‘विवेचकैः’ भेदज्ञानी पुरुषोए ‘न अव्यापि अतिव्यापि वा’ अव्याप्ति अने अतिव्याप्ति दूषणोथी रहित ‘चैतन्यम्’ चेतनपणाने जीवनुं लक्षण कह्युं छे. भेदज्ञानीओए एटले धर्मी जीवोए अनुभव करीने राग अने अमूर्तपणाथी भिन्न एवा चेतनपणाने जीवनुं लक्षण कह्युं छे. रागादि भावो जीवनी सर्व अवस्थाओमां व्यापता नथी. माटे रागादिने जीवनुं लक्षण मानतां अव्याप्तिनो दोष आवे छे. ज्यारे अमूर्तपणुं अन्य द्रव्योमां पण छे, तेथी तेने जीवनुं लक्षण कहेतां एमां अतिव्याप्तिनो दोष आवे छे.

आवुं समजवा मळे नहि एटले लोको तो दया पाळो, व्रत करो अने उपवास करो-एम क्रियाओ करवाथी आत्मलाभ थशे एम माने छे. पण भाई! ए तो बधी रागनी क्रियाओ छे. ए क्रियाओ तो अचेतन जड छे, ए क्रियाओ वडे चैतन्यनो-आत्मानो लाभ केम थाय? वळी अमूर्तपणा वडे पण आत्मा जाणी शकातो नथी केमके अमूर्तपणुं तो धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश अने काळ एम अन्य द्रव्योमां पण छे. तेथी आम जाणीने धर्मी जीवोए चैतन्यपणाने जीवनुं निर्दोष लक्षण कह्युं छे.

जाणवुं, जाणवुं, जाणवुं-ए जाणक एवा चैतन्यतत्त्वनुं लक्षण छे. अर्थात् ज्ञानलक्षण वडे आत्माने लक्ष करीने तेनो अनुभव थई शके छे, सम्यग्दर्शन पामी शकाय छे. अहाहा! ज्ञानलक्षण वडे लक्ष्य एवा आत्माने पकडतां तेनो अनुभव थाय छे अने ते धर्म छे. परंतु दया, दान, व्रत के भक्तिथी आत्मा पकडाय एम नथी केमके ते कोई आत्मानुं लक्षण नथी. ए तो सर्व राग छे अने रागनी आत्मामां अव्याप्ति छे. आत्मानी सर्व अवस्थाओमां ए राग व्यापीने रहेता नथी, कदाचित् संसार अवस्थामां ते हो, पण मोक्ष अवस्थामां ते सर्वथा नथी. माटे राग आत्मानुं लक्षण नथी. तेथी गमे तेवो मंद राग होय तोपण ते वडे भगवान आत्मा जणातो नथी. तेवी रीते अमूर्तपणा वडे पण भगवान आत्मा जाणी शकातो नथी, केमके अमूर्तपणा वडे आत्माने जाणतां अतिव्याप्तिनो दोष आवे छे. आम विचारीने भेदज्ञानी जीवोए चैतन्यपणाने जीवनुं लक्षण कह्युं छे. अहाहा! ज्ञानना परिणमननी जे दशा छे ते लक्षण छे अने ते द्वारा आत्मा जाणी शकाय छे. त्रिकाळी चैतन्यतत्त्वने लक्ष करी ज्ञाननुं जे परिणमन थाय छे ते परिणमननी दशामां भगवान आत्मा जणाय छे अने ए ज्ञानना परिणमननी क्रिया ते धर्म छे.

हवे कहे छे के ‘समुचितम्’ ते योग्य छे. शुं? के चैतन्यपणाने जीवनुं लक्षण कहेवुं ते समुचित एटले योग्य छे, बराबर छे. केम? केमके ते अव्याप्ति अने अतिव्याप्ति दोषथी रहित छे. अहा! न्यायथी-युक्तिथी वात करे छे. कहे छे के आत्मा ज्ञान द्वारा जणाय एम छे केमके भगवान आत्मा त्रिकाळ ज्ञानस्वरूप छे. राग ए तारुं लक्षण नहि, केमके ते सर्व अवस्थाओमां व्यापतो नथी तेथी तेनी आत्मामां अव्याप्ति छे. परंतु ज्ञान ए तारुं-आत्मानुं लक्षण छे केमके आत्मा त्रिकाळ ज्ञानस्वरूप छे. जीवनी सर्व अवस्थाओमां ज्ञान प्रसरे छे, तेथी ज्ञानलक्षण अव्याप्ति-दोषरहित छे. वळी आत्माने