Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २२९ छोडीने ज्ञान कोई अन्य द्रव्यमां छे नहि. तेथी आत्मानुं ज्ञानलक्षण अतिव्याप्ति दोषथी रहित छे. आ प्रमाणे चैतन्यपणाने जीवनुं लक्षण कहेवुं बराबर छे, व्याजबी छे.

अहाहा! भगवान आत्मा अंदर चैतन्यनुं बिंब प्रभु ज्ञाननो गांठडो छे. एमांथी अनंत अनंत केवळज्ञानादि प्रगटे तोपण कांई खूटे नहि एवो ए ज्ञाननो रसकंद छे. ए ए तो ज्ञाननुं मूळ छे जेमांथी ज्ञान अखूटपणे नीकळ्‌या ज करे. आवो आत्मा वर्तमान ज्ञाननी पर्याय वडे जणाय छे. एटले के वर्तमान ज्ञाननी पर्याय ज्ञायकस्वभावी आत्मानुं लक्ष करे त्यां ‘आ ज्ञायकबिंब छे’ एम आत्मा जणाय छे. आनुं नाम सम्यग्ज्ञान छे. आ ज्ञाननी क्रिया ए धर्मनी क्रिया छे. आ प्रमाणे ज्ञानलक्षण ए आत्मानुं समुचित एटले योग्य लक्षण छे.

आगळ कहे छे के-‘व्यक्तम्’ ते चैतन्यलक्षण प्रगट छे. चैतन्यने जाणनारी पर्याय प्रगट छे माटे चैतन्यलक्षण प्रगट छे एम कहे छे. ए प्रगट चैतन्यलक्षण द्वारा ‘आत्मा ज्ञानस्वरूप त्रिकाळ’ छे एम जाणी शकाय छे. गजब वात! अहा! आत्मा तो ‘अजायबघर’ छे. ते अनंतगुणोरूप अजायबीओथी भरपुर छे. वर्तमान ज्ञानपर्याय तेने जाणे, पण त्यां जे जणाय छे ते ज्ञान (आत्मा) तो अहाहा! अनंत अने अमाप छे. आमां ‘मों-माथुं हाथ आवे नहि’ (समजण पडे नहि) एटले लोको बिचारा शुं करे? व्रत, तप, इत्यादिमां जोडाई जाय. आम ने आम तुं अनंतकाळथी करतो आव्यो छे, पण भाई! व्रत, तपना विकल्प ए आत्मानुं (एने जाणवानुं) लक्षण नथी. कहे छे के इन्द्रियोने बंध करी, इन्द्रियोना जे विषय थाय छे तेनुं लक्ष छोडी दईने तथा मनना लक्षे उपजता विकल्पोनुं पण लक्ष छोडी दईने अंदर चैतन्यस्वभावी भगवान आत्माने चैतन्यलक्षण वडे अनुभववो ते सम्यग्दर्शन पामवानी रीत छे. आत्मा चैतन्यबिंब छे. चैतन्यनी जे प्रगट ज्ञानदशा ते एनुं लक्षण छे. माटे प्रभु! ए लक्षण द्वारा अंदर जा अने जो तो तेनो अनुभव थशे. अहाहा! ज्ञाननी पर्याय अंतर्मुख थई स्वने जाणे छे त्यारे अंदर तो अद्भुत अनंतगुणनो चैतन्यगोळो जणाय छे. तथा जे अनंतगुणो भर्या छे एने पण ज्ञान देखी ले छे.

बापु! वीतराग सर्वज्ञ परमेश्वरे आम ज कह्युं छे अने संतो पण एम ज कहे छे. भाई! तुं तने पोताने पकडीने कयारे अनुभवी शके? के ज्ञाननी पर्यायने-लक्षणने पकडीने स्वमां जाय त्यारे. आ सिवाय गमे तेवा मंदरागथी-दानादि क्रियाथी आत्मा जणाय एम नथी.

प्रश्नः– तो अमारे दान करवुं के नहि?

उत्तरः– भाई! ए दान करवानो-रागनी मंदतानो भावो आवे ए जुदी वात छे.