Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ पण तेथी कांई आत्मा न जणाय, सम्यग्दर्शन न थाय. आत्मा तो चैतन्यलक्षण जे प्रगट ज्ञाननी पर्याय छे तेने अंदर वाळतां जणाय.

हवे कहे छे के-चैतन्यलक्षण व्यक्त-प्रगट छे अने ‘व्यञ्जित–जीव–तत्त्वम्’ तेणे जीवना

यथार्थ स्वरूपने प्रगट कर्युं छे, एटले के जाणवानी जे दशा छे-जे लक्षण छे -ते प्रगट छे अने तेणे आखा चैतन्यतत्त्वने प्रगट कर्युं छे, अहाहा! ज्ञाननी पर्यायने ज्ञायकभाव तरफ वाळतां- ढाळतां, तेणे ज्ञायकने प्रगट कर्यो छे एम कहे छे. वर्तमान ज्ञाननी पर्यायने अंतरमां वाळतां शुद्ध चैतन्यस्वभावमय जीवनो अनुभव थाय छे अने तेथी तेणे जीवना यथार्थ स्वरूपने प्रगट कर्युं छे एम कहे छे.

भगवान आत्मा ज्ञानानंदनो कंद प्रभु छे, ते अनादिनो एवो ने एवो छे. तेने वर्तमान ज्ञानलक्षण-ज्ञाननी पर्याय ‘आ चीज आवी छे’ एम प्रगट करे छे.

प्रश्नः– पण आवो आत्मा देखातो नथी ने?

उत्तरः– भाई! एने तुं अंदर देखवा जाय छे ज कयां? देखवा जाय तो देखाय ने? ज्ञाननेत्र उघाडीने अंदर जुए तो देखाय ने? भाई! ‘आत्मा नथी देखातो,’ ‘मने हुं नथी देखातो’ एवो निर्णय कर्यो कोणे? एवो निर्णय कर्यो शामां? एवो निर्णय पोते ज्ञाननी पर्यायमां कर्यो छे, अने ए ज ज्ञान आत्मा छे. ए ज्ञाननी पर्यायने पकडीने अंदर जा तो आनंदनो नाथ भगवान जरूर देखाशे. बापु! आ तो जन्म-मरणना चक्रावानो अंत लाववानी अपूर्व वात छे. बाकी बीजुं बधुं (व्रत, तप आदि) तो घणुं कर्युं छे.

अहीं तो कहे छे के भगवान आत्मा त्रिकाळ ज्ञानस्वरूप छे, अने तेनी वर्तमान पर्यायमां पण ज्ञानअंश प्रगट छे. हवे जे ज्ञानअंश प्रगट छे ते ज्ञानलक्षण वडे त्रिकाळी ज्ञायकस्वभावने पकड अने तेनो अनुभव कर. ए ज्ञानलक्षणथी अनुभव थई शकशे कारण के ते ज्ञायकनुं वास्तविक लक्षण छे. शुं कहे छे? जाणवानी पर्याय वर्तमानमां प्रगट छे के नहि? न होय तो ‘आ शरीर छे, राग छे’ एम जाणे कोण? माटे ज्ञानपर्याय प्रगट छे. परंतु ए ज्ञानपर्याय परने जाणे छे. छतां ते एनुं-परनुं लक्षण नथी. ज्ञानपर्याय तो स्वद्रव्यनुं लक्षण छे. एने अंतरमां वाळीने जो तो तने आत्मा देखाशे, सम्यग्दर्शन थशे. आवो मार्ग कदी सांभळ्‌यो होय नहि एटले ‘अहिंसा परमो धर्मः’ -कोई जीवने न मारवो ए धर्म छे अने ए बधा सिद्धांतनो सार छे-एम प्ररूपणा करे छे. आ मळ्‌युं ज नथी एटले बिचारा शुं करे?

प्रश्नः– तो अमारे पर जीवोनी दया पाळवी के नहि?

उत्तरः– भाई! पर जीवनी दया आत्मा कयां पाळी शके छे? पर जीवनी दया हुं पाळी शकुं छुं ए भाव तो मिथ्यात्व छे. तथा पर जीवनी दया पाळवानो जे